Sunday, January 24, 2021

धर्म के नाम पर लोग फसाद और एक दूसरे का कत्लेआम करते है? इतने सारे धर्म है वो क्यूँ है, यदि ईश्वर एक है तो?


ईश्वर (अल्लाह) ने मनुष्य को समझ और दिमाग़ दिया है उसका प्रयोग करें सत्य और असत्य को ढूँढने मैं 

बात सही है कि धर्म के नाम पर लोग मारे जाते है, किन्तु वास्तविकता में कुछ पाखंडी लोग धर्म का नाम ले कर अधर्म के द्वारा फसाद और कत्लेआम करते है? 

जबकि धर्म दीन तो शान्ति और नैतिकता की बात करता है।

धर्म के बिना दुनिया रहने लायक ही नहीं बचेगी। 

क्यूँकि फ़िर मानवता के बुनियादी उसूल और नैतिकता के लिये कोई धरातल ही नहीं बचेगा। 

धर्म से बंधे होने के बाद भी जानते बुझते लोग कितनी जुल्मो ज़्यादती करते है? 

यदि उन्हें खुली छूट मिल जायें तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि क्या होगा?

नैतिकता का कोई मैयार ही नहीं बचेगा। 

हर वह बात जिसे नैतिकता मानते है उसे चैलेंज किया जा सकेगा।

अच्छाई और बुराई का पैमाना ही ख़त्म हो जायेगा और दुनिया मे बहुसंख्या द्वारा अल्पसंख्यकों का, ताक़तवर द्वारा कमज़ोर का दमन और उत्पीड़न आम हो जाएगा। 

धर्म आवश्यक है इसीलिये हमारे पैदा करने वाले ने हमे धर्म दिया।

लेकिन स्वार्थी मनुष्यों ने हमेशा धर्म को अपने कंट्रोल में करने की कोशिश की और ईश्वर के आदेशों में अपने स्वार्थ के लिये बदलाव किये 

जिसके परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर अधर्म वुजूद मे आया और दुनिया मे इतने सारे धर्म, मत, सम्प्रदाय और फिरक़े वुजूद में आयें।

किन्तु हमारे मालिक ने हमे ऐसे ही नहीं छोड़ दिया। 

उस अति कृपालु महान अल्लाह ने हमारे मार्गदर्शन के लिये नबी यानी अपने सन्देष्टा भेजे। 

ताकि वह मनुष्यों को उनके जीवन के वास्तविक उद्देश्य से अवगत करायें, और अंतिम सन्देष्टा मुहम्मद (सल्लo) के साथ इन सन्देष्टाओ की श्रृंखला को पूर्ण कर दिया।

Saturday, April 25, 2020

इस्लाम में तलाक और हलाला की हक़ीक़त



इस्लाम से पहले किसी मज़हब में तलाक का कांसेप्ट नहीं था।

अल्लाह ने इंसानो के लिए एक आसानी की कि अगर पति पत्नी की आपस में नहीं बन रही है तो वो तलाक ले कर अलग हो सकते है और दूसरी जगह शादी कर सकते है।

लेकिन लोग कहीं पति पत्नी के इस खूबसूरत रिश्ते को खेल-तमाशा ना बना लें,
कि ज़रा-ज़रा सी बात पर तलाक ले कर अलग हो जायें और फ़िर कुछ दिन बाद निकाह कर लें फ़िर ज़रा सी बात पर तलाक, तो इस तरह जो फॅमिली सिस्टम है वो पूरी तरह बिगड़ जाएगा और बच्चों की परवरिश भी ठीक से नहीं हो पाएगी।

इसके लिये अल्लाह ने कुछ हद्द और लिमिट भी तय कर दी।

निकाह (शादी) कोई खेल तमाशा नहीं यह संजीदा (serious) मामला है,
अल्लाह ने इंसान को तीन मौक़े दिए तलाक के लिये की अगर आपकी नहीं बनती तो आप तलाक ले कर अलग हो जाओ
लेकिन इंसान कई बार जल्दबाजी में बिना सोचे समझे फ़ैसले ले लेता है।

और बाद मे उन पर पछतावा करता है इसी प्रकार किसी ने जल्दबाजी में या वक़्ती ग़ुस्से में तलाक दे दी और फ़िर बाद में अफ़सोस हुआ कि मैंने यह क्या किया अपना पूरा बसा हुआ घर बर्बाद कर लिया,
तो उसके पास दोबारा मौक़ा है कि वो अपनी बीवी से इद्दत (तलाक के बाद 3 महीने का समय जिसमें पत्नी उसी पति के घर में रहती है) के दौरान रुजु कर सकता है बिना निकाह के या इद्दत के बाद नया निकाह करके दोबारा से पति पत्नी की तरह रह सकते है।

फ़िर कुछ समय बाद किसी वजह से उनमें तलाक हो जाता है तो फिर यही प्रकिया (same process) है दोबारा से पति पत्नी की तरह रह सकते है फ़िर किसी वजह से तलाक होती है तो अब इस्लाम मे इस पर पाबंदी लग जाती है, कि तुमने पति पत्नी जैसे महत्वपूर्ण रिश्ते को मजाक बना रखा है अब दोबारा उन पति पत्नी का निकाह नहीं हो सकता इतने मौक़े आपको मिले लेकिन आपने उनकी क़दर नहीं की शादी को खेल-तमाशा, हँसी-मज़ाक़ बना दिया
अब तीसरी बार यह लोग शादी करके पति पत्नी बन कर नहीं रह सकते।

सिवाय एक कंडीशन के कि उस औरत के लिए (बिना किसी प्लानिंग के) कोई रिश्ता आता है और औरत की पसंद से औरत का निकाह कहीं और हो जाता है और फ़िर दूसरे पति के साथ मे भी कोई ऐसी कंडीशन आती है (ध्यान रहे यह हालात ख़ुद से आये हो ना कि कोई सुनियोजित तरीके से) और दूसरा पति भी उन्हें तलाक दे देता है तो फ़िर अब वो औरत चाहे तो अपने पहले पति से निकाह कर सकती है।

जो लोग यह काम सुनियोजित (pre-planned) तरीक़े से करते है
उनके बारे मे आप सल्लo ने फ़रमाया:
"हलाला करने वाले और हलाला करवाने वाले (दोनों) पर लानत फरमायी है."
- तिरमिज़ी, हदीस नंo 1120

लेखक : ज़ीशान अली

#TeenTalaq #DivorceInIslam #TripleTalaq

Sunday, June 23, 2019

क्या क़ुरआन कहता है कि जहा काफिरों को पाओ उन्हें मार डालो?


कुरान मे है:
"फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो काफिरों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
-कुरान 9:5

कुरआन के खिलाफ़ बोलने वाले  लोग अक्सर इस आयात को पेश करते है और कहते है कि अल्लाह मुसलमानों को काफिरों को मारने का हुक्म देता है,
और वो इसके आगे पीछे की आयतों को छुपा जाते है इससे आप उनकी नियत का अंदाज़ा लगा सकते है कि अगर कुरआन पर उंगली उठाने वाले यह लोग सच्चे होते तो आगे पीछे की आयते ज़रूर पेश करते ताकि इसका पूरा प्रसंग समझा जा सके क्यूँकि किसी भी बात को अगर उसके प्रसंग (पसमंज़र) से अलग करके बयान किया जाए तो अर्थ का अनर्थ किया जा सकता है इससे ज़ाहिर होता है इनका मक़सद सिर्फ इस्लाम के विरुध्द दुष्प्रचार करना है।
अब इस आयत को आगे पीछे की आयतों के साथ पढ़ें तो बात समझ मे आयेगी

*सूरह अत-तौबा, 9*

9:1 "मुशरिकों (बहुदेववादियों) से जिनसे तुमने संधि की थी, विरक्ति (की उदघोषणा) है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से।"

9:2 "अतः इस धरती में चार महीने और चल-फिर लो और यह बात जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और यह कि अल्लाह इनकार करनेवालों को अपमानित करता है।"

9:3 "सार्वजनिक उदघोषणा है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से, बड़े हज के दिन लोगों के लिए, कि "अल्लाह मुशरिकों के प्रति ज़िम्मेदारी से बरी है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम तौबा कर लो, तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है, किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो, तो जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते।" और इनकार करनेवालों के लिए एक दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो।"

9:4 "सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की, तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"

9:5 "फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"

9:6 "और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं।"

9:7 "इन मुशरिकों को किसी संधि की कोई ज़िम्मेदारी अल्लाह और उसके रसूल पर कैसे बाक़ी रह सकती है? - उन लोगों का मामला इससे अलग है, जिनसे तुमने मस्जिदे-हराम (काबा) के पास संधि की थी, तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तब तक तुम भी उनके साथ सीधे रहो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"

सारी आयतों से साफ पता चलता है कि यहाँ बात एक विशेष प्रकार के लोगो के बारे मे चल रही है सारे गैर मुस्लिमों के बारें में नहीं, यह आयात मक्के के कुछ विशेष लोगो के बारे मे है जिनकी मुसलमानो से संधि थी इस अध्याय (सूरह) मे उस संधि का ज़िक्र भी है, जब मक्का के उन मुशरिको ने संधि करने के बाद उसे तोड़ा और मुसलमानों से जंग के लिये अमादा हो गए तो अल्लाह ने भी मुसलमानों को प्रोत्साहित करने के लिए यह बाते कही जो कि आम तौर पर हर आर्मी चीफ़ अपनी सेना से कहता है कि दुश्मन को जहा पाओ मार डालो लेकिन अचंभे की बात यह है कि इसी अध्याय मे अल्लाह ने इसके साथ यह भी हुक्म दिया कि अगर जंग के मैदान में भी कोई तुमसे अमन की बात करें तो जंग को भूल कर अपनी जान पर खेलकर उसकी हिफाज़त करो और उसे महफूज़ जगह पहुचा कर आओ।

ऐसा आदेश दुनिया का कोई भी कमांडर नहीं दे सकता।
और इसी अध्याय की दूसरी आयात मे अल्लाह ने यह भी वाज़ेह कर दिया कि यह आदेश सिर्फ उन मुशरिको के लिए है जिन्होंने संधि तोड़ कर तुमसे ऐलान ए जंग किया है, और बाक़ी लोग जैसे वो जिन्होंने मस्जिद ए हराम (काबा) के पास तुमसे संधि की आदि के लिए नहीं है, उनके साथ तुम अच्छा सुलूक रखो और संधि को पूरा करते रहो।
यह एक विशेष आदेश है और विशेष लोगो के लिये था आम गैर-मुस्लिमों के साथ कैसा बर्ताव करना है वो और आयतों में ज़िक्र है उदहारण के लिए इस आयत में आम आदेश मौजूद है :
"जिन लोगो ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुमको तुम्हारे घरो से निकाला, उनके साथ भलाई और इन्साफ का सुलूक करने से अल्लाह तुमको मना नहीं करता, अल्लाह तो इन्साफ करने वालो को दोस्त रखता हैं।"
- कुरान 60:08

लेखक : ज़ीशान अली

#Surah_Tawba #काफिर_और_क़ुरआन

Monday, June 17, 2019

तो यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी है।


आज के वक़्त में अक्सर यह देखनें में आता है कि किसी इंसान को अगर थोड़ी सी भी परेशानी या तकलीफ पहुँचताी है तो वह बहुत ज़्यादा परेशान और बेचैन हो उठता है और थोड़ी सी परेशानी से भी इतना घबरा जाता है कि अपने मालिक कि दी हुई सर्वश्रेष्ठ नेमत इस ज़िन्दगी को भी ख़त्म करने के बारे में भी सोचने लगता हैं हक़ीक़त में उसकी इस घबराहट और परेशानी की वजह उसका अपने ज़िन्दगी के मक़सद  से नावाक़िफियत हैं उसने इस  फ़ानी (नश्वर) दुनियावी ज़िन्दगी को ही हक़ीक़त समझ लिया है जबकि गहराई से देखें तो इस ज़िन्दगी और मौत को अल्लाह ने बनाया ही इसीलिये है ताकि इन्सानों कि आज़माईश की जायें कि कौन अल्लाह का कितना शुक्रगुज़ार और फरमाबरदार हैं (ज़्यादा जानकारी के लिये मेरा पिछला लेख "जीवन का उद्देश्य" पढ़ें और उससे भी अधिक तफसीर से जानने के लिये एक बार क़ुरान का तर्जुमा ज़रूर पढ़ें), ज़रा उन लोगों के बारें में सोचिये जिनकों तपती हुई रेत मे रस्सी से बांध कर लिटा कर उनके जिस्म पर भारी पत्थरो को रख दिया गया, उनकों उनके घरों से निकाल दिया गया, सगे-रिश्तेदार उनके दुश्मन हो गये सिर्फ़ इसलियें कि वह कहते थे कि हमारा माबू्द सिर्फ़ एक अल्लाह है, जिस जन्नत के वह दावेदार थे हम भी उसी जन्नत के दावेदार है तो फिर परेशानिया और तकलीफे तो आयेगी ही क़ुरान में हमारा पैदा करने वाला हमारा मालिक फरमाता है,
 "क्या तुम यह गुमान करते हों कि जन्नत में चलें जाओगें हालांकि तुम पर वह हालात नहीं आयें जो तुमसे पहले लोगों पर आयें थें। उन्हें बीमारियां और मुसीबतें पहुंची और वह यहां तक झिन्झोड़ें गयें कि (उस समय का) रसुल और उसके साथ वाले ईमान वाले कहने लगें कि अल्लाह कि मदद कब आयेगी? सुन रखों कि अल्लाह कि मदद क़रीब है।"
- क़ुरान 2: 214

ज़रा तसव्वुर कीजियें क्या तकलीफें रही होंगी? जो उस वक़्त के ईमान वालों के साथ उनका रसुल भी पुकार उठा कि अल्लाह की मदद कब आयेगी हम तसव्वुर (कल्पना) भी नहीं कर सकते उनके कष्टों की, कैसी कैसी तकलीफ़ और सज़ाये उन्हे पहुची जो उस दौर का नबी जिसका सीधा राबता अल्लाह से होता है वो भी चीख़ उठा की अल्लाह की मदद कब आयेगी फिर अल्लाह ने यहाँ यह भी बता दिया कि अल्लाह कि मदद क़रीब है यानि आपकी ज़िंदगी में कितनी बड़ी आज़माईश कितनी बड़ी परेशानी क्यों न आ जायें उसके बाद अल्लाह की मदद क़रीब हैं, और यक़ीनी तौर पर अल्लाह की मदद आयेगी ज़रूर, इसी बात को अल्लाह तआला ने एक दुसरी सूरह में कुछ इस तरह बयान किया
"तो यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी (राहत) हैं. यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी हैं"
- क़ुरान 94: 5-6

एक बात को दो बार दोहराने का मक़सद यह होता है कि उस बात को ज़ोर देकर कहा गया है आप सोचिये जब अल्लाह किसी बात को ज़ोर देकर कहें तो भला उसमें किसी प्रकार का सन्देह या शुब्हा बाक़ी रहता हैं? क़तई नहीं,

फिर एक और स्थान पर अल्लाह तआला ने फरमाया कि
"अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त (बरदाश्त) से ज़्यादा बोझ नहीं डालते"
- क़ुरान 2:286

इस आयत से यह भी पता चला कि परेशानी कितनी बड़ी क्यों ना हो इंसान के बर्दाश्त से बाहर नहीं वह डट कर उसका सामना कर सकता है क्योंकि अल्लाह तआला कभी इन्सान पर ऐसी परेशानी नहीं डालते जो उसके बर्दाश्त के बाहर हो आज़माईश के अलावा इन्सान पर परेशानी या कष्ट आने की वजह इन्सान के अपने आमाल (कर्म) भी होते है बहुत सारी परेशानिया उस पर उसके आमाल की वजह से भी आती हैं, अल्लाह फरमाता हैं "जो मुसीबत तुम्हें पहुंचती है वह तो तुम्हारें अपने हाथों की कमाई से पहुंचती है और बहुत कुछ तो वह माफ कर देता है।"
- क़ुरान 42:30

इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपने आमाल अच्छे रखें साथ ही ज़रूरतमंदो को सदक़ा (दान) करता रहें यानी गरीबों की मदद करें क्यूंकि ज़कात व सदक़ा (दान) आने वाली मुसीबतो और परेशानियों को टाल देता है।

लेखक : ज़ीशान अली

#DivineMotivation #ना_उम्मीदी_कुफ्र_है

Thursday, February 7, 2019

मुस्लिम आतंकवाद या एक सुनियोजित साज़िश?


इस्लाम के बारे मे आज के समय में वो लोग बता रहे हैं जिन्हें इस्लाम का शाब्दिक अर्थ ही नहीं पता यूँ तो बातिल ने हमेशा ही हक़ को बदनाम करने की कोशिश की है।

 लेकिन जब से अरब देशों में पेट्रोल मिला हैं तब से अमेरिका सहित यूरोपियन देश किसी तरीक़े से अरब देशों के निज़ाम को अपने हाथ में लेना चाहते है, उनके सामने समस्या यह थी कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दुनिया ने उनका जो असली चेहरा देखा वो बहुत ही वहशी और बर्बर था जिसमें इंसानियत के लिए कोई जगह नज़र नहीं आती थी उसको छुपाने के लिये उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations organization) के माध्यम से ख़ुद को शांति दूत बनाने की कोशिश की थी, अब उन्हें उस युद्ध में हुए नुक़सान की भी भरपाई करनी थी और इसके लिये उनकी सीधी नज़र अरब देशों के पेट्रोल पर थी लेकिन शांति दूत के चेहरे के साथ दुनिया के ठेकेदार बनकर वो यह काम करते तो उनकी बची खुची इज़्ज़त और भरोसा भी लोगो से उठ जाता तो उन्होंने एक दूसरा रास्ता अपनाया जो कि हिटलर के तरीक़े से प्रेरित था, धीरे-धीरे करके एक ख़ास समुदाय और क़ौम के लिए लोगो के  दिलों में नफरत और घृणा का माहौल पैदा कर दो।
और इस काम को उन्होंने अंजाम दिया मीडिया के ज़रिये  मुहम्मद (सल्लo) के आने के बाद से मुसलमानों के 1400 साल के इतिहास मे उन्हें कभी किसी ने दहशतगर्द या आतंकवादी नहीं कहा पिछले 30-40 साल के अंदर यह खेल शुरू हुआ और प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध (पहली और दूसरी जंगे अज़ीम) को अंजाम देने वाले दहशतगर्द मुल्कों ने हर तरीक़े से इस्लाम को बदनाम करने की पूरी कोशिश की फ़िर जब देखा कि पूरी दुनिया हमारी बातों में और कंट्रोल में आ चुकी हैं तो मीडिया के ज़रिये ही झूटी अफवाहें फैला कर एक एक करके जिन मुस्लिम देशों में पेट्रोल निकलता हैं उन पर हमला करना शुरू किया शुरुआत हुईं इराक़ से जहा बड़ी तादाद में पेट्रोल पाया जाता हैं बहाना था कि इराक़ के पास जैविक हथियार है सबूत था BBC के ज़रिये चलायी गयी बस एक ख़बर एक खुशहाल देश को कुछ वक़्त में ही बदहाल बना दिया गया आज सालों गुज़रने के बाद भी वहा के लोग बदहाल है, हज़ारों लोगों का क़त्लेआम कर दिया गया शहर खण्डरो में बदल गये लेकिन वहां एक भी जैविक हथियार नहीं मिला उसके बाद भी इन दुनिया के ठेकेदार देशों ने माफी मांगने के बजाये एक-एक करके दूसरे मुस्लिम देशों को अपना निशाना बनाना शुरू किया जो सिलसिला आज भी जारी हैं आज रोज़ के हिसाब से मुसलमानों का क़त्लेआम हो रहा है लेकिन अफसोस दुनिया मे कोई इन दुनिया के ठेकेदारों से पूछने वाला नहीं हैं।

ISIS जैसे संगठनों को इन्होने मुस्लिम राष्ट्रों को बर्बाद करने के लिये तैयार किया और उनका हौवा खड़ा करके दुनिया को भी डरा रहे हैं ताकि मुसलमानों के क़त्लेआम के खिलाफ़ कोई आवाज़ ना उठाये ISIS पर कार्यवाही का कह कर आम मुसलमानों का क़त्लेआम  किया जा रहा हैं सीरिया इसका हाल का उदहारण है जहां मासूम बच्चों और औरतों पर भी केमिकल हथियार तक इस्तेमाल किए जा रहे हैं, सोचने वाली बात है वो अमेरिका जो एक क्षण में विश्व युद्ध का नतीजा बदल सकता है एक झूठी अफवाह पर पूरे देश को तबाह-बर्बाद कर सकता है क्या वो एक छोटे से संगठन को ख़त्म नहीं कर सकता जिसके बारे में सारी दुनिया के मुस्लिम धर्मगुरुओं (आलिमों) ने फतवा दे दिया हो कि इसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं और उसका पुरजोर विरोध किया हो क्या ऐसे संगठन को ख़त्म करना अमेरिका जैसे देश के लिये मुश्किल काम है?
लेकिन बात यह है कि जब पैदा ही अमेरिका का किया हो तो फिर वो उसे ख़त्म क्यूँ करेगा?
मलाला यूसुफज़ई के वाक़िये के खुलासे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि किस तरह पश्चिमी देश इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।

ध्यान रहे आज दुनिया में सबसे ज्यादा आतंकवाद के शिकार मुसलमान और मुस्लिम देश ही है लेकिन फिर भी मीडिया मज़लूम को ही ज़ालिम बना कर पेश कर रहा है।

#TruthOfIslamicTerrorism  #मुस्लिमआतंकवादकीहक़ीक़त

अल्लाह (ईश्वर) का अस्तित्व

क्या ऐसा संभव है कि किसी छापेखाने (Printing Press) में आग लग जाएं और सब कुछ जल कर ख़त्म हो जाएं लेकिन वहा स्वयं से एक बहुत अच्छे कवर वाली एक अच्छी किताब ख़ुद बा ख़ुद अस्तित्व में आजाएं?

और सही सलामत अवस्था में वो लोगो को मिले?

नहीं??

क्यूँ???

जबकि एक किताब के छप कर तय्यार होने के लिए आवश्यक सामग्री तो उस छापे खाने में पहले से ही मौजूद थी फ़िर ऐसा क्यूँ संभव नहीं?

आप कहेंगे बिना किसी किताब छापने वाले व्यक्ति के भला कैसे एक किताब स्वयं से अस्तित्व में आ सकती है? 

भले ही सारी सामग्री मौजूद हो फ़िर भी बिना किताब बनाने वाले के किताब का बनना संभव नही, और यह कहना कि छापे खाने में आग लगने के बाद सिर्फ़ उसके धमाके से किताब अस्तित्व में आ सकती है यह तो खुली मूर्खता है।

हाँ जी यह मूर्खता ही है।

किंतु जब बात इस सृष्टि के अस्तित्व में आने की आती है तो हम इसी जैसी मूर्खता में ही विश्वास कर लेते है वहा हमे यह मूर्खता नहीं लगती?

नहीं सोचते कि इतना सुन्दर और पूर्ण (Perfect) ब्रह्मांड यह कायनात सिर्फ़ एक धमाके से स्वयं से अस्तित्व में कैसे आ सकती है? 
जब इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के मुक़ाबले में एक तुच्छ किताब भी बनाने वाले की मोहताज है तो फिर यह ब्रह्मांड कैसे ख़ुद-ब-ख़ुद वुजूद में आ सकता है? 
जहा हर चीज़ अपनी उत्तम दिशा (Perfect Direction) मे है और करोड़ो अरबों सालो से उसकी यह व्यवस्था बरक़रार है। 

मनुष्य के जीवन का हर लम्हा इस बात का गवाह है कि यह संपूर्ण व्यवस्था किसी बनाने वाले की मोहताज है और उसकी ओर संकेत करती है, उसकी निशानदेही करती है, मनुष्य का स्वयं का अस्तित्व ही उसके बनाने वाली के ज्ञान और कमाल को बयान करता है। 

परंतु शायद मनुष्य स्वयं को एक किताब से भी तुच्छ समझता है जो यह तो मानता है कि एक किताब स्वयं से अस्तित्व में नहीं आ सकती किंतु मनुष्य जो सर्वश्रेष्ठ जीव है वो स्वयं अस्तित्व में आ सकता है?

अजीब है ना!

"शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उन के अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उन पर स्पष्ट हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ का साक्षी है।"
- क़ुरआन 41:53

#ExistenceOfGod #ख़ुदाकावुजूद

मांसाहार बनाम शाकाहार: एक व्यावहारिक दृष्टिकोण


मांसाहार का संबंध सिर्फ़ इस्लाम से नहीं है दुनिया की 80% से ज़्यादा आबादी मांसाहारी है शाकाहार विश्वपटल पर एक व्यवहारिक धारणा या विचारधारा नहीं है।
यदि आप दुनिया के कुछ देशों में जहाँ अत्याधिक बर्फ होने के कारण खेती संभव नहीं है शाकाहार की बात भी करेंगे तो लोग आप के दुश्मन बन जायेंगे और हो सकता है आपको जान के लाले पड़ जाएँ और कुछ देशों में तो समुन्द्री जीवों (मछलियां, केकड़ा आदि) को शाकाहार में ही शुमार किया जाता है और अधिकतर पश्चिमी देशों में जहां खेती होती भी है वहां शाकाहारी वस्तुएँ (दाल, सब्ज़ियां आदि) इतनी महँगी होती है कि वहा के पैसे वाले लोग ही दाल सब्ज़ियों को खा पाते है।

इसके अतिरिक्त मनुष्य वैज्ञानिक रूप से भी सर्वहारी प्राणी है अर्थात वह प्राणी जो शाकाहार और मांसाहार दोनों का सेवन कर सकता है मनुष्य की रचना ही ईश्वर ने इस प्रकार की है कि वह दाल सब्ज़िया भी खा सके और मांस भी वरना जो जीव शाकाहारी होते है वो मांसाहार का सेवन कर ही नहीं कर सकते ना ही उनका शरीर मांसाहार को स्वीकार करता है उनका पाचन तंत्र सिर्फ शाकाहार के लिये बना होता है, जो मांस को पचा ही नहीं सकता एक बकरी को आप मांस दीजिए खाने को वो उसे कदापि नहीं खाएगी और ना ही उसे पचा पाएगी इसके उलट जो मांसाहारी जन्तु होते हैं उनकी शारीरिक संरचना इस प्रकार से होती है कि उनका शरीर शाकाहार को स्वीकार ही नहीं कर सकता आप एक शेर को सब्ज़िया दीजिए खाने को वो उन्हें नहीं खायेगा ना ही उसका पाचन तंत्र उसे स्वीकार करेगा।

यह ईश्वर की बनायी हुई व्यवस्था है उसी ने शाकाहारी चीज़ों के साथ कुछ जीव भी खाने योग्य बनाये है,अगर ईश्वर मनुष्य को शाकाहारी बनाना चाहता तो वो शाकाहारी जीवो की तरह उसका पाचन तंत्र इस प्रकार से बनाता की वो केवल शाकाहारी वस्तुओं को खा पाएं कुछ लोग मांसाहार को जीव हत्या से भी जोड़ कर देखते है जो कि पूर्णतः अव्यावहारिक बात है क्यूँकि इस धरती की रचना ही अल्लाह (ईश्वर) ने इस प्रकार से की हैं कि यहा हर स्थान और वस्तु का संबन्ध जीव से है हर वस्तु में जीव और जीवन मौजूद है।

हम साँस लेते है तब वायु में मौजूद अनेकों सूक्ष्म जीवों की हत्या होती है खेती के दौरान तो असंख्य सूक्ष्म जीव मारे जाते हैं और विज्ञान बताता है कि पेड़-पौधे में भी जीवन होता है तो क्या यह जीव हत्या नहीं? और केवल यही क्यूँ बाज़ार में जो मच्छर, मक्खी, चूहे, कॉकरोच आदि मारने की दवाई बिकती है क्या उससे जीव हत्या नहीं होती फिर उसका विरोध क्यूँ नहीं?

#मांसाहार_व्यावहारिक_दृष्टिकोण
 #NonVegFoodVSVegFood

पैग़म्बर मुहम्मदﷺ का कल्याणकारी संदेश (Golden words of prophet Muhammadﷺ)



"Allah is kind and lenient and likes that one should be kind and lenient in all matters."
- Sahi Bukhari 6927

"अल्लाह दयालु व उदार है, और हर मामले में उदारता व दया किये जाने को पसंद करता है."
- सही बुख़ारी 6927


"Cleanliness is half of faith." 
- Sahi Muslim 223

"स्वच्छता (पाकीज़गी) आधा ईमान है."
- सही मुस्लिम 223


The Compassionate One has mercy on those who are merciful. If you show mercy to those who are on the earth, He Who is in the heaven will show mercy to you.
- Abu Dawud, 4941

दया (रहम) करने वालों पर रहमान (ईश्वर) भी दया करता है, तुम धरती वालों पर दया करो आसमान वाला तुम पर दया करेगा
- अबु दावुद, 4941


"The worst people are those whom the people desert or leave in order to save themselves from their dirty language or from their transgression."
- Sahi Bukhari 6054

"वह बदतरीन (अत्यंत बुरा) व्यक्ति है जिसे उस की बदकलामी (अमर्यादित भाषा) के डर से लोग छोड़ दें."
- सही बुख़ारी 6054


"Verily Allah does not look to your faces and your wealth but He looks to your heart and to your deeds."
- Sahi Muslim 2564 c

"निसंदेह अल्लाह तुम्हारी सूरतों और मालों को नही देखता मगर वह तुम्हारे दिलों और कर्मों को देखता है. "
- सही मुस्लिम 2564


"The best amongst you are those who have the best manners and character."
- Bukhari 3559

"तुम में से उत्तम वह हैं जिनके आचरण अच्छे हों।"
- बुख़ारी 3559

"By Allah, he does not believe! whose neighbor does not feel safe from his evil. "
- Sahi Bukhari 6016

"अल्लाह की क़सम वह ईमान वाला नही जिसकी बुराई से उसका पड़ोसी सुरक्षित न रहें." 
- सही बुख़ारी 6016


"A man is not a believer who fills his stomach while his neighbor is hungry." 
- Al Adab Al Mufrad 112

"वह व्यक्ति मोमिन नहीं जो स्वयं भरपेट खाता हो जबकि उसका पड़ोसी भूखा हो." 
- अल अदब अल मुफरद 112


“Charity does not in any way decrease the wealth."
- Sahi Muslim 2588

"दान करने से माल कम नहीं होता।"
- सही मुस्लिम 2588


"Do not abuse anyone." 
- Abu Dawood 4084

"किसी को भी गाली न दो." 
- अबु दावुद 4084


"The best of you is the one whose goodness is hoped for, and people are safe from his evil. And the worst of you is he whose goodness is not hoped for, and people are not safe from his evil."
- Tirmizi 2263

"तुम में सर्वश्रेष्ठ (बेहतरीन) वह है जिससे (लोग) भलाई की उम्मीद रखें, और लोग उसकी बुराई से सुरक्षित रहें. और तुम में बुरा वह है जिससे (लोग) भलाई की उम्मीद न रखें, और लोग उसकी बुराई से सुरक्षित न रहें. "
- तिर्मिज़ी 2263


"Virtue is a kind disposition and vice is what rankles in your heart and that you disapprove that people should come to know of it."
- Sahi Muslim 2553

"नेकी अच्छे आचरण का नाम है और पाप वह है जो आपके हृदय में खटके और आप अप्रिय समझें कि लोगों को उसकी सूचना मिले।" 
- सही मुस्लिम 2553


"If anyone usurps the property by taking an oath, he will meet Allah while his hand is mutilated. "
- Abu Dawood 3244

"जो शख़्स (झूठी) क़सम खा कर किसी का माल हड़प कर लेगा तो क़यामत (महाप्रलय) के दिन वह अल्लाह के यहां कोढ़ी (जिसे कोढ़ की बीमारी हुई हो) हो कर पेश होगा."
- अबु दावुद 3244


"Anyone who dies worshipping others along with Allah will definitely enter the Fire. I said, Anyone who dies worshipping none along with Allah will definitely enter Paradise."
- Sahi Bukhari 1238

"जो कोई इस अवस्था मे मरा कि वह (अपने जीवन में) किसी को अल्लाह (ईश्वर) का साझी ठहराता था तो वह नर्क में जायेगा और मैं यह कहता हुँ कि जो कोई इस अवस्था में मरा कि वह अल्लाह का कोई साझी नही ठहराता तो वह स्वर्ग (जन्नत) में जायेगा. "
- सही बुख़ारी 1238


"Whoever loves that he be granted more wealth and that his lease of life be prolonged then he should keep good relations with his Kith and kin."
- Sahi Bukhari 5986

"जिसे यह बात खुश करती हो कि उसकी आजीविका (कमाई) में वृद्धि हो और उसकी आयु (उम्र) लम्बी कर दी जाए उसे चाहिए कि अपने रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करे।"
- सही बुख़ारी 5986


"Who conceals the faults of others in this world, Allah would conceal his faults on the day of Resurrection. "
- Sahi Muslim 6490

"जो कोई दुनिया मे किसी के ऐब (दोष) छुपायेगा, कयामत (महाप्रलय) के दिन अल्लाह उसके ऐबों को छुपायेगा."
- सही मुस्लिम 6490


"The best of you is the best to his wives." 
- Tirmizi 3895

"तुम में बेहतरीन लोग वह हैैं जो अपनी पत्नियों के साथ सबसे अच्छे हों. "
- तिर्मिज़ी 3895


"Allah has forbidden you: disobedience to your mothers."
- Sahih Bukhari, 2408

"अल्लाह  ने तुम पर हराम (वर्जित) किया है कि तुम अपनी माँ की आज्ञा की अवहेलना (नाफ़रमानी) करो."
- सही बुख़ारी, 2408


"He (Allah) has declared absolutely haram the disobedience of father. "
- Sahi Muslim 593 i

"अल्लाह ने तुम पर हराम (वर्जित) किया है कि तुम अपने पिता की अवहेलना (नाफरमानी) करो. "
- सही मुस्लिम 593


"I urge you to treat women well. "
- Sahi Bukhari 5186

"मैं तुम्हें औरतों (महिलाओं) के बारे में अच्छें व्यवहार की वसीयत करता हूँ."
- सही बुख़ारी 5186


 "Seek among your weak ones, for you are given provision and help only because of the weak amongst you."
- Riyad as-Salihin: Book 1, Hadith # 272

"कमज़ोर (दुर्बल) लोगों को तलाश करो, तुम्हें उन्हीं (की दुआओं अर्थात प्रार्थनाओं) के कारण रोज़ी और सहायता प्रदान की जाती हैं."
- रियाज़ुस्सालीहीन: किताब 1 हदीस # 272


"Whoever believes in Allah and the Last Day should not hurt (trouble) his neighbor. "
- Sahi Bukhari 5185

"जो व्यक्ति अल्लाह और अन्तिम दिन पर  ईमान (विश्वास) रखता हो वह अपने पड़ोसी को कष्ट (तकलीफ़) न पहुचाँयें."
 - सही बुख़ारी 5185


"Indeed among the believers with the most complete faith is the one who is the best in conduct, and the most kind to his family."
- Tirmizi 2612

"सबसे अधिक पूर्ण (कामिल) ईमान वाला मोमिन वह हैं जो सबसे अच्छे आचरण वाला हो और जो अपने बाल-बच्चों पर सर्वाधिक कृपालु हो. "
- तिर्मिज़ी 2612


"There is none amongst the Muslims who plants a tree or sows seeds, and then a bird, or a person or an animal eats from it, but is regarded as a charitable gift for him. "
- Sahi Bukhari 2320

"कोई भी मुसलमान जो एक पेड़ का पौधा लगायें या खेत में बीज बोये फिर उससे पक्षी या इन्सान या जानवर जो भी खाते हैं वह उसकी (पौधा लगाने वाले वाले की ओर से) सदका (दान)  है. "
- सही बुख़ारी 2320


Prophetﷺ said: "Shall I not inform you of something more excellent in degree than fasting, prayer and almsgiving (sadaqah)?" The people replied: Yes, Prophet of Allah! He said: "It is putting things right between people."
- Abu Dawood 4919

पैग़म्बरﷺ ने फरमाया: "क्या में तुम्हें वह बात न बताऊ जो (पुण्य) स्तर मे रोज़े, नमाज़ और ज़कात (दान) से बढ़ कर हैं?" लोगों ने कहा क्यों नहीं, आप ने फरमाया: "आपस में लोगों मे मेल जोल (सदभाव) करा देना. "
- अबु दावुद 4919


"Allah, the Exalted and Glorious, said:
My servants, I have made oppression unlawful for Me and unlawful for you, so do not commit oppression against one another."
- Sahi Muslim 2577 a

"अल्लाह ने फरमाया:
मेरे बन्दों मैंने ज़ुल्म (अत्याचार) करना अपने ऊपर हराम (वर्जित) किया है और तुम्हारे दरमियान (मध्य में) भी उसे हराम किया है, इसलिये तुम एक दूसरे पर अत्याचार न करो."
- सही मुस्लिम 2577


"The Muslim is the one from whose tongue and hand the people are safe, and the believer is the one from whom the people's lives and wealth are safe."
- Nasai 4995

"मुसलमान वह है जिसकी ज़बान (शब्दों) और हाथ से लोग सुरक्षित रहें, और मोमिन वह है जिससे लोगों का जीवन और माल सुरक्षित रहें।" 
- नसाई 4995


"None of you believes until he loves for his brother what he loves for himself."
- Sahi Muslim 45 a

"तुम में से कोई भी ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक के वह अपने भाई के लिये भी वह पसंद न करें जो वह अपने लिये पसंद करता है." 
- सही मुस्लिम 45


"Pride is disdaining the truth (out of self-conceit) and contempt for the people."
- Sahi Muslim 91

"सत्य को स्वीकार न करना तथा लोगों को स्वयं से तुच्छ (कमतर) समझना ही अहंकार (घमंड) है."
- सही मुस्लिम 91


"He who has in his heart the weight of a mustard seed of pride shall not enter Paradise."
- Sahi Muslim 91

"जिसके मन में कण बराबर भी अहंकार (घमण्ड) होगा वह स्वर्ग (जन्नत) में प्रवेश नहीं पायेगा."
- सही मुस्लिम 91


"The person who severs the bond of kinship will not enter Paradise."
- Sahi Bukhari 5984

"रिश्तों को तोड़ने वाला व्यक्ति स्वर्ग (जन्नत) मे प्रवेश नहीं पायेगा."
- सही बुख़ारी 5984


"Whoever wants to enter paradise,  let him treat people the way he would love to be treated. "
- Sahi Muslim 1844

"जो कोई जन्नत (स्वर्ग) में प्रवेश करना चाहता हैं उसे चाहिये कि वह लोगों से उस प्रकार व्यवहार करें जिस प्रकार के व्यवहार की वह दुसरो से अपने  लिये किये जाने की अपेक्षा करता हैं."
- सही मुस्लिम 1844


“The curse of Allah is upon the one who offers a bribe and the one who takes it.”
- Ibne Majah 2313

"रिश्वत देने वाले और रिश्वत लेने वाले दोनों पर अल्लाह की लानत है."
- इब्ने माजा 2313


"Beware of suspicion, for suspicion is the worst of false tales."
- Sahi Bukhari 6064

"बदगुमानी (शक) से बचो क्योंकि शक की बाते अधिकतर झूठी होती है."
- सही बुख़ारी 6064


"The example of a good companion (who sits with you) in comparison with a bad one, is I like that of the musk seller and the blacksmith's bellows (or furnace); from the first you would either buy musk or enjoy its good smell while the bellows would either burn your clothes or your house, or you get a bad nasty smell thereof."
- Sahi Bukhari 2101

"नेक साथी और बुरे साथी की मिसाल  कस्तुरी बेचने वाले और लोहार की सी है, कस्तूरी बेचने वाले के पास से तुम दो अच्छाइयों में सें एक न एक अवश्य पा लोगे या तो कस्तूरी ही ख़रीद लोगे वरना कम से कम उसकी ख़ुशबू तो अवश्य ही पा सकोगे लेकिन लोहार की भट्टी (की तपिश) तुम्हारे शरीर को झुलसा देगीं वरना बदबू तो उससें तुम अवश्य पा लोगे." 
- सही बुख़ारी 2101


"The believer does not insult the honor of others, nor curse, nor commit Fahishah, nor is he foul."
- Tirmizi 1977

"मोमिन ताना देने वाला, लानत (धिक्कार) करने वाला, अश्लील और अपशब्द कहने वाला नही होता. "
- तिर्मीज़ी 1977


"Nothing is heavier on the believer's Scale on the Day of Judgment than good character." 
- Tirmizi 2002

"क़यामत (महाप्रलय) के दिन मोमिन के (कर्मों के) तराज़ु में अच्छे किरदार (चरित्र) से भारी कोई चीज़ नही होगी." 
- तिर्मिज़ी 2002


“Don't consider anything insignificant out of good things even if it is that you meet your brother with  cheerful countenance. "
- Sahi Muslim 2626

"किसी भी भलाई को तुच्छ (कमतर) न जानो, यधपि (भले ही)  आप का अपने भाई से मुस्कुराते चेहरे से मिलना ही क्यों न हो"।
- सही मुस्लिम 2626


"I guarantee a house in the surroundings of Paradise for a man who avoids quarrelling even if he were in the right, a house in the middle of Paradise for a man who avoids lying even if he were joking, and a house in the upper part of Paradise for a man who made his character good."
- Abu Dawood 4800

"मैं उस व्यक्ति को जन्नत (स्वर्ग) मे एक घर का आश्वासन (ज़मानत) देता हूँ, जो लड़ाई झगड़ा छोड़ दें भले ही वह हक़ (सच) पर हों, और जन्नत के बीचों बीच एक घर का उस व्यक्ति के लिये जो झूठ बोलना छोड़ दें भले ही वह हंसी मज़ाक़ में हों, और जन्नत की बुलंदी पर एक घर का उस व्यक्ति के लिये जो अपना चरित्र अच्छा बना लें."
- अबू दावुद 4800


"Whoever believes in Allah and the Last Day, should unite the bond of kinship (i.e. keep good relation with his kith and kin)."
- Sahi Bukhari 6138

"जो कोई अल्लाह और अन्तिम दिन पर विश्वास रखता है उसे चाहिये की वह रिश्तों को बनाए रखें (अर्थात अपने रिश्तेदारो के साथ अच्छा सुलूक़ करें)."
- सही बुख़ारी 6138


"Riches does not mean, having a great amount of property, but riches is selfcontentment."
- Sahi Bukhari 6446

"अस्ल अमीरी यह नहीं की माल अधिक हो, बल्कि अमीरी यह है कि (व्यक्ति) दिल से अमीर हो." 
- सही बुख़ारी 6446


"Beware! The extremists perished."
He (the Holy Prophet) repeated this thrice.
- Abu dawood 4608

"ख़बरदार! चरमपंथी (इंतेहापसंद) बर्बाद हो गए (अर्थात तुम चरमपंथ से बचों). "
आपने इसे तीन बार दोहराया.
- अबु दावुद 4608

Wednesday, February 6, 2019

प्राचीनतम धर्म इस्लाम

इस्लाम की पुनर्स्थापना से पहले अरब जाहिलियत में डूबे हुए थे हर बुराइ उनमें आम थी और मूर्ति पूजा का प्रचलन था लेकिन यह हमेशा से नहीं था अरब अपने आपको इब्राहिम अ.स. का मानने वाला कहते थे लेकिन इब्राहिम अ.स. ने जिस धर्म की पुनर्स्थापना की थी वो इस्लाम ही था (पुनर्स्थापना इसलिये क्यूँकि इस्लाम की स्थापना इब्राहिम अलैहिस्सलाम से भी बहुत पहले इस पृथ्वी पर आये सर्वप्रथम मनुष्य आदम अलैहिस्सलाम द्वारा की गयी थी) लेकिन बाद में अरबो ने इब्राहिम अ.स. की दी हुई शिक्षाओं को बिगाड़ कर धर्म के नाम पर यह सारी बुराइयाँ जोड़ ली थी जिसका शुद्धिकरण करके 1400 साल पहले आखि़री नबी (अंतिम ईशदूत) मुहम्मद साहब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अरब में धर्म की उसके वास्तविक और शुध्द स्वरूप में पुनर्स्थापना की थी। 

Friday, December 21, 2018

जीवन की उत्पत्ति और डार्विन की थ्योरी

डार्विन की क्रमिक विकास (Evolution) की थ्योरी के अनुसार जीवो में उनकी खाने-पीने और रहन-सहन की आदतो के परिणामस्वरूप शारीरिक बदलाव हुए, इसका आमतौर पर उदहारण यह दिया जाता है कि जिराफ की गर्दन इसलिये ऊंची होती है क्यूंकि उनके पूर्वज ऊंची टहनियों पर लगे पत्ते उचक कर खाया करते थे जिसके परिणामस्वरूप उनके शरीर में बदलाव हुआ उनकी गर्दनें ऊँची हो गयी।
अब यदि कोई ऐसा जीव हो जिसकी गर्दन लंबी और ऊँची हो किन्तु वो अपना सर नीचे ज़मीन की ओर करके खाता हो, फ़िर भी जब सीधा हो तो गर्दन ऊपर की ओर लंबी और ऊँची रहे तो यह डार्विन के क्रमिक विकास के सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत और विरुध्द होगा?

मैं आपको ऐसे जीव का नाम बताता हूँ वह जीव है शुतुरमुर्ग (Ostrich) जो खाते समय अपनी लंबी ऊँची गर्दन को नीचे धरती की ओर करके खाता है पत्ते, जड़े, कीड़े-मकोड़े आदि उसका भोजन है जिन्हे खाते समय या किसी ख़तरे का आभास होने पर वह अपना सर नीचे कर लेता है किन्तु इसके बावजूद भी उसके शरीर में परिवर्तन नहीं आया कि उसकी गर्दन नीचे की ओर झुक जाती जैसा कि डार्विन का सिद्धांत बताता है। ऐसे अनेकों तथ्य और गवाहियाँ दुनिया मे मौजूद है जिनसे पता चलता है कि जीवो मे क्रमिक विकास जैसी कोई चीज़ कभी हुई ही नहीं, बल्कि जिस तरह अल्लाह ने उन्हें बनाया वो उसी प्रकार से वैसे ही मौजूद है या कुछ प्रजातिययों का अस्तित्व ख़त्म हो गया किन्तु वो एक जीव से दूसरे जीव में कभी परिवर्तित नहीं हुए।

#TheoryOfEvolution #क्रमिकविकासकासिद्धांत #CreationOfAllah

Tuesday, April 11, 2017

एकेश्वरवाद

क्या एक बस (Bus) के एक साथ 2 ड्राइवर हो सकते हैं? क्या एक स्कूल के 2 प्रिंसिपल हो सकते हैं? क्या एक देश के 2 प्रधानमंत्री एक साथ हो सकते है?

जवाब है नहीं, क्यूंकि एक बस को अगर 2 लोग एक साथ चलाएं तो कुछ समय बाद यक़ीनन एक्सिडेंट होगा इसी प्रकार यदि किसी स्कूल के 2 प्रिंसिपल हो या किसी देश के 2 प्रधानमंत्री हो तो वो स्कूल या देश नहीं चल पायेगा संतुलन ही बिगड़ जाएगा, अब ज़रा विचार कीजीए इस इतनी विशाल सृष्टि को अनगिनत समय से चलाने वाला तथा आश्चर्यजनक रूप से उसका संतुलन बनाए रखने वाला क्या एक से अधिक हो सकता है और उस एक सच्चे ईश्वर को ही हम अल्लाह कहते है जो कि इस संपूर्ण सृष्टि का बनाने वाला और पालने वाला है। 


क़ुरआन (सूरह अल इख्लास) 112


 قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ
कहो, "वह अल्लाह यकता है,

  اللَّهُ الصَّمَدُ
अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है,

  لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ
न वह जनिता है और न जन्य,

  وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ

और न कोई उसका समकक्ष है।"

जीवन का उद्देश्य तथा क़िस्मत

"मनुष्य मात्र एक जीव नहीं हैं बल्कि यह अल्लाह की सर्वश्रेष्ठ रचना है जिसे उसने सर्वश्रेष्ठ कार्य अर्थात अपनी इबादत के लिए पैदा किया हैं।"

ईश्वर (अल्लाह) ने दुनिया मे सारी चीज़ें मनुष्य के उपयोग और उपभोग के लिए बनायी है अगर आप अपने आसपास दृष्टि डालें और ग़ौर करें तो आप देखेंगे कि हर वस्तु कही ना कहीं मनुष्य को ही लाभ पहुंचाती हैं ज़मीन फसल पैदा करती हैं तो क्या वो स्वयं उसे इस्तेमाल करती है? नहीं,
क्या वृक्ष अपने फल ख़ुद खा जाता है? नहीं,
क्या सूर्य अपनी अग्नि स्वयं के लिए इस्तेमाल करता हैं? नहीं, क्या समुंदर अपना पानी स्वयं पी जाता हैं? नहीं,
क्या भेड़ अपना ऊन स्वयं इस्तेमाल करती हैं? नहीं।

फिर इन सारी चीज़ों का सर्वाधिक लाभ कौन उठाता है?

ज़ाहिर सी बात है मनुष्य और सिर्फ यह ही नहीं इसके अलावा भी संसार मे जो कुछ भी है कही ना कही उससे मनुष्य को ही लाभ पहुंचता हैं।

तो यह सारी सृष्टि ईश्वर (अल्लाह) ने मनुष्य के लिए बनायी मगर मनुष्य को उसने किस लिए बनाया?

यह बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल हैं इसी सवाल से ही मानवता का अस्तित्व है और इसी प्रश्न का जवाब पाकर ही मनुष्य निजात अथवा मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग पा सकता है।

ईश्वर ने मनुष्य को अपनी इबादत के लिए पैदा किया साथ ही मुक्त-इच्छा यानी freewill दी यह आज़माने के लिए की इतना सब कुछ उसके लिए करने के बावजूद भी मनुष्य ईश्वर (अल्लाह) के बताए मार्ग को अपनाता हैं या उसके विरुद्ध शैतान (राक्षस) के मार्ग पर चलता है? यह ही मनुष्य की अस्ल परीक्षा है, अगर वो परीक्षा में सफल होता है और ईश्वर के बताए मार्ग पर चलता है तो इस छोटे से जीवन के बाद जो सदैव का अनंत जीवन हैं उसमें वह हर वस्तु से सुसज्जित सुखमय जीवन वाले स्वर्ग अर्थात जन्नत में रहेगा अन्यथा अगर वह ईश्वर से बगावत वाला राक्षसी मार्ग अपना कर जीवन गुज़ारता हैं तो वह अनंत दुखों और यातनाओं वाले नर्क जहन्नुम में कभी ना समाप्त होने वाला जीवन गुज़ारेगा। अब यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह कौनसा मार्ग अपनाता हैं?

ईश्वर ने मनुष्य को मुक्त इच्छा (freewill) दी है कि वह इस जीवन में जैसे जी चाहे कर्म करें चाहे तो छुरी से किसी की हत्या कर दें और चाहें तो उसी छुरी से सब्ज़ी काटकर भूखे को खाना खिलाएं यह मुक्त रूप से उसका स्वयं का निर्णय है, हाँ फिर यह भी बता दिया है कि सारे मनुष्य को लौट कर ईश्वर के पास वापस आना है और फिर ईश्वर की अदालत में प्रत्येक मनुष्य से उसके हर एक कर्म का हिसाब लिया जायेगा जो उसने दुनिया में किया था और फिर उसके ईमान और कर्मो के अनुसार ही उसका फैसला होगा।

#जीवनकाउद्देश्य #क़िस्मत #PurposeOfLife