इस्लाम के बारे मे आज के समय में वो लोग बता रहे हैं जिन्हें इस्लाम का शाब्दिक अर्थ ही नहीं पता यूँ तो बातिल ने हमेशा ही हक़ को बदनाम करने की कोशिश की है।
लेकिन जब से अरब देशों में पेट्रोल मिला हैं तब से अमेरिका सहित यूरोपियन देश किसी तरीक़े से अरब देशों के निज़ाम को अपने हाथ में लेना चाहते है, उनके सामने समस्या यह थी कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दुनिया ने उनका जो असली चेहरा देखा वो बहुत ही वहशी और बर्बर था जिसमें इंसानियत के लिए कोई जगह नज़र नहीं आती थी उसको छुपाने के लिये उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations organization) के माध्यम से ख़ुद को शांति दूत बनाने की कोशिश की थी, अब उन्हें उस युद्ध में हुए नुक़सान की भी भरपाई करनी थी और इसके लिये उनकी सीधी नज़र अरब देशों के पेट्रोल पर थी लेकिन शांति दूत के चेहरे के साथ दुनिया के ठेकेदार बनकर वो यह काम करते तो उनकी बची खुची इज़्ज़त और भरोसा भी लोगो से उठ जाता तो उन्होंने एक दूसरा रास्ता अपनाया जो कि हिटलर के तरीक़े से प्रेरित था, धीरे-धीरे करके एक ख़ास समुदाय और क़ौम के लिए लोगो के दिलों में नफरत और घृणा का माहौल पैदा कर दो।
और इस काम को उन्होंने अंजाम दिया मीडिया के ज़रिये मुहम्मद (सल्लo) के आने के बाद से मुसलमानों के 1400 साल के इतिहास मे उन्हें कभी किसी ने दहशतगर्द या आतंकवादी नहीं कहा पिछले 30-40 साल के अंदर यह खेल शुरू हुआ और प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध (पहली और दूसरी जंगे अज़ीम) को अंजाम देने वाले दहशतगर्द मुल्कों ने हर तरीक़े से इस्लाम को बदनाम करने की पूरी कोशिश की फ़िर जब देखा कि पूरी दुनिया हमारी बातों में और कंट्रोल में आ चुकी हैं तो मीडिया के ज़रिये ही झूटी अफवाहें फैला कर एक एक करके जिन मुस्लिम देशों में पेट्रोल निकलता हैं उन पर हमला करना शुरू किया शुरुआत हुईं इराक़ से जहा बड़ी तादाद में पेट्रोल पाया जाता हैं बहाना था कि इराक़ के पास जैविक हथियार है सबूत था BBC के ज़रिये चलायी गयी बस एक ख़बर एक खुशहाल देश को कुछ वक़्त में ही बदहाल बना दिया गया आज सालों गुज़रने के बाद भी वहा के लोग बदहाल है, हज़ारों लोगों का क़त्लेआम कर दिया गया शहर खण्डरो में बदल गये लेकिन वहां एक भी जैविक हथियार नहीं मिला उसके बाद भी इन दुनिया के ठेकेदार देशों ने माफी मांगने के बजाये एक-एक करके दूसरे मुस्लिम देशों को अपना निशाना बनाना शुरू किया जो सिलसिला आज भी जारी हैं आज रोज़ के हिसाब से मुसलमानों का क़त्लेआम हो रहा है लेकिन अफसोस दुनिया मे कोई इन दुनिया के ठेकेदारों से पूछने वाला नहीं हैं।
ISIS जैसे संगठनों को इन्होने मुस्लिम राष्ट्रों को बर्बाद करने के लिये तैयार किया और उनका हौवा खड़ा करके दुनिया को भी डरा रहे हैं ताकि मुसलमानों के क़त्लेआम के खिलाफ़ कोई आवाज़ ना उठाये ISIS पर कार्यवाही का कह कर आम मुसलमानों का क़त्लेआम किया जा रहा हैं सीरिया इसका हाल का उदहारण है जहां मासूम बच्चों और औरतों पर भी केमिकल हथियार तक इस्तेमाल किए जा रहे हैं, सोचने वाली बात है वो अमेरिका जो एक क्षण में विश्व युद्ध का नतीजा बदल सकता है एक झूठी अफवाह पर पूरे देश को तबाह-बर्बाद कर सकता है क्या वो एक छोटे से संगठन को ख़त्म नहीं कर सकता जिसके बारे में सारी दुनिया के मुस्लिम धर्मगुरुओं (आलिमों) ने फतवा दे दिया हो कि इसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं और उसका पुरजोर विरोध किया हो क्या ऐसे संगठन को ख़त्म करना अमेरिका जैसे देश के लिये मुश्किल काम है?
लेकिन बात यह है कि जब पैदा ही अमेरिका का किया हो तो फिर वो उसे ख़त्म क्यूँ करेगा?
मलाला यूसुफज़ई के वाक़िये के खुलासे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि किस तरह पश्चिमी देश इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
ध्यान रहे आज दुनिया में सबसे ज्यादा आतंकवाद के शिकार मुसलमान और मुस्लिम देश ही है लेकिन फिर भी मीडिया मज़लूम को ही ज़ालिम बना कर पेश कर रहा है।
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