क्या ऐसा संभव है कि किसी छापेखाने (Printing Press) में आग लग जाएं और सब कुछ जल कर ख़त्म हो जाएं लेकिन वहा स्वयं से एक बहुत अच्छे कवर वाली एक अच्छी किताब ख़ुद बा ख़ुद अस्तित्व में आजाएं?
और सही सलामत अवस्था में वो लोगो को मिले?
नहीं??
क्यूँ???
जबकि एक किताब के छप कर तय्यार होने के लिए आवश्यक सामग्री तो उस छापे खाने में पहले से ही मौजूद थी फ़िर ऐसा क्यूँ संभव नहीं?
आप कहेंगे बिना किसी किताब छापने वाले व्यक्ति के भला कैसे एक किताब स्वयं से अस्तित्व में आ सकती है?
नहीं??
क्यूँ???
जबकि एक किताब के छप कर तय्यार होने के लिए आवश्यक सामग्री तो उस छापे खाने में पहले से ही मौजूद थी फ़िर ऐसा क्यूँ संभव नहीं?
आप कहेंगे बिना किसी किताब छापने वाले व्यक्ति के भला कैसे एक किताब स्वयं से अस्तित्व में आ सकती है?
भले ही सारी सामग्री मौजूद हो फ़िर भी बिना किताब बनाने वाले के किताब का बनना संभव नही, और यह कहना कि छापे खाने में आग लगने के बाद सिर्फ़ उसके धमाके से किताब अस्तित्व में आ सकती है यह तो खुली मूर्खता है।
हाँ जी यह मूर्खता ही है।
किंतु जब बात इस सृष्टि के अस्तित्व में आने की आती है तो हम इसी जैसी मूर्खता में ही विश्वास कर लेते है वहा हमे यह मूर्खता नहीं लगती?
नहीं सोचते कि इतना सुन्दर और पूर्ण (Perfect) ब्रह्मांड यह कायनात सिर्फ़ एक धमाके से स्वयं से अस्तित्व में कैसे आ सकती है?
हाँ जी यह मूर्खता ही है।
किंतु जब बात इस सृष्टि के अस्तित्व में आने की आती है तो हम इसी जैसी मूर्खता में ही विश्वास कर लेते है वहा हमे यह मूर्खता नहीं लगती?
नहीं सोचते कि इतना सुन्दर और पूर्ण (Perfect) ब्रह्मांड यह कायनात सिर्फ़ एक धमाके से स्वयं से अस्तित्व में कैसे आ सकती है?
जब इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के मुक़ाबले में एक तुच्छ किताब भी बनाने वाले की मोहताज है तो फिर यह ब्रह्मांड कैसे ख़ुद-ब-ख़ुद वुजूद में आ सकता है?
जहा हर चीज़ अपनी उत्तम दिशा (Perfect Direction) मे है और करोड़ो अरबों सालो से उसकी यह व्यवस्था बरक़रार है।
मनुष्य के जीवन का हर लम्हा इस बात का गवाह है कि यह संपूर्ण व्यवस्था किसी बनाने वाले की मोहताज है और उसकी ओर संकेत करती है, उसकी निशानदेही करती है, मनुष्य का स्वयं का अस्तित्व ही उसके बनाने वाली के ज्ञान और कमाल को बयान करता है।
परंतु शायद मनुष्य स्वयं को एक किताब से भी तुच्छ समझता है जो यह तो मानता है कि एक किताब स्वयं से अस्तित्व में नहीं आ सकती किंतु मनुष्य जो सर्वश्रेष्ठ जीव है वो स्वयं अस्तित्व में आ सकता है?
अजीब है ना!
"शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उन के अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उन पर स्पष्ट हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ का साक्षी है।"
- क़ुरआन 41:53
#ExistenceOfGod #ख़ुदाकावुजूद












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