Sunday, June 23, 2019

क्या क़ुरआन कहता है कि जहा काफिरों को पाओ उन्हें मार डालो?


कुरान मे है:
"फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो काफिरों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
-कुरान 9:5

कुरआन के खिलाफ़ बोलने वाले  लोग अक्सर इस आयात को पेश करते है और कहते है कि अल्लाह मुसलमानों को काफिरों को मारने का हुक्म देता है,
और वो इसके आगे पीछे की आयतों को छुपा जाते है इससे आप उनकी नियत का अंदाज़ा लगा सकते है कि अगर कुरआन पर उंगली उठाने वाले यह लोग सच्चे होते तो आगे पीछे की आयते ज़रूर पेश करते ताकि इसका पूरा प्रसंग समझा जा सके क्यूँकि किसी भी बात को अगर उसके प्रसंग (पसमंज़र) से अलग करके बयान किया जाए तो अर्थ का अनर्थ किया जा सकता है इससे ज़ाहिर होता है इनका मक़सद सिर्फ इस्लाम के विरुध्द दुष्प्रचार करना है।
अब इस आयत को आगे पीछे की आयतों के साथ पढ़ें तो बात समझ मे आयेगी

*सूरह अत-तौबा, 9*

9:1 "मुशरिकों (बहुदेववादियों) से जिनसे तुमने संधि की थी, विरक्ति (की उदघोषणा) है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से।"

9:2 "अतः इस धरती में चार महीने और चल-फिर लो और यह बात जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और यह कि अल्लाह इनकार करनेवालों को अपमानित करता है।"

9:3 "सार्वजनिक उदघोषणा है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से, बड़े हज के दिन लोगों के लिए, कि "अल्लाह मुशरिकों के प्रति ज़िम्मेदारी से बरी है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम तौबा कर लो, तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है, किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो, तो जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते।" और इनकार करनेवालों के लिए एक दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो।"

9:4 "सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की, तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"

9:5 "फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"

9:6 "और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं।"

9:7 "इन मुशरिकों को किसी संधि की कोई ज़िम्मेदारी अल्लाह और उसके रसूल पर कैसे बाक़ी रह सकती है? - उन लोगों का मामला इससे अलग है, जिनसे तुमने मस्जिदे-हराम (काबा) के पास संधि की थी, तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तब तक तुम भी उनके साथ सीधे रहो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"

सारी आयतों से साफ पता चलता है कि यहाँ बात एक विशेष प्रकार के लोगो के बारे मे चल रही है सारे गैर मुस्लिमों के बारें में नहीं, यह आयात मक्के के कुछ विशेष लोगो के बारे मे है जिनकी मुसलमानो से संधि थी इस अध्याय (सूरह) मे उस संधि का ज़िक्र भी है, जब मक्का के उन मुशरिको ने संधि करने के बाद उसे तोड़ा और मुसलमानों से जंग के लिये अमादा हो गए तो अल्लाह ने भी मुसलमानों को प्रोत्साहित करने के लिए यह बाते कही जो कि आम तौर पर हर आर्मी चीफ़ अपनी सेना से कहता है कि दुश्मन को जहा पाओ मार डालो लेकिन अचंभे की बात यह है कि इसी अध्याय मे अल्लाह ने इसके साथ यह भी हुक्म दिया कि अगर जंग के मैदान में भी कोई तुमसे अमन की बात करें तो जंग को भूल कर अपनी जान पर खेलकर उसकी हिफाज़त करो और उसे महफूज़ जगह पहुचा कर आओ।

ऐसा आदेश दुनिया का कोई भी कमांडर नहीं दे सकता।
और इसी अध्याय की दूसरी आयात मे अल्लाह ने यह भी वाज़ेह कर दिया कि यह आदेश सिर्फ उन मुशरिको के लिए है जिन्होंने संधि तोड़ कर तुमसे ऐलान ए जंग किया है, और बाक़ी लोग जैसे वो जिन्होंने मस्जिद ए हराम (काबा) के पास तुमसे संधि की आदि के लिए नहीं है, उनके साथ तुम अच्छा सुलूक रखो और संधि को पूरा करते रहो।
यह एक विशेष आदेश है और विशेष लोगो के लिये था आम गैर-मुस्लिमों के साथ कैसा बर्ताव करना है वो और आयतों में ज़िक्र है उदहारण के लिए इस आयत में आम आदेश मौजूद है :
"जिन लोगो ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुमको तुम्हारे घरो से निकाला, उनके साथ भलाई और इन्साफ का सुलूक करने से अल्लाह तुमको मना नहीं करता, अल्लाह तो इन्साफ करने वालो को दोस्त रखता हैं।"
- कुरान 60:08

लेखक : ज़ीशान अली

#Surah_Tawba #काफिर_और_क़ुरआन

Monday, June 17, 2019

तो यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी है।


आज के वक़्त में अक्सर यह देखनें में आता है कि किसी इंसान को अगर थोड़ी सी भी परेशानी या तकलीफ पहुँचताी है तो वह बहुत ज़्यादा परेशान और बेचैन हो उठता है और थोड़ी सी परेशानी से भी इतना घबरा जाता है कि अपने मालिक कि दी हुई सर्वश्रेष्ठ नेमत इस ज़िन्दगी को भी ख़त्म करने के बारे में भी सोचने लगता हैं हक़ीक़त में उसकी इस घबराहट और परेशानी की वजह उसका अपने ज़िन्दगी के मक़सद  से नावाक़िफियत हैं उसने इस  फ़ानी (नश्वर) दुनियावी ज़िन्दगी को ही हक़ीक़त समझ लिया है जबकि गहराई से देखें तो इस ज़िन्दगी और मौत को अल्लाह ने बनाया ही इसीलिये है ताकि इन्सानों कि आज़माईश की जायें कि कौन अल्लाह का कितना शुक्रगुज़ार और फरमाबरदार हैं (ज़्यादा जानकारी के लिये मेरा पिछला लेख "जीवन का उद्देश्य" पढ़ें और उससे भी अधिक तफसीर से जानने के लिये एक बार क़ुरान का तर्जुमा ज़रूर पढ़ें), ज़रा उन लोगों के बारें में सोचिये जिनकों तपती हुई रेत मे रस्सी से बांध कर लिटा कर उनके जिस्म पर भारी पत्थरो को रख दिया गया, उनकों उनके घरों से निकाल दिया गया, सगे-रिश्तेदार उनके दुश्मन हो गये सिर्फ़ इसलियें कि वह कहते थे कि हमारा माबू्द सिर्फ़ एक अल्लाह है, जिस जन्नत के वह दावेदार थे हम भी उसी जन्नत के दावेदार है तो फिर परेशानिया और तकलीफे तो आयेगी ही क़ुरान में हमारा पैदा करने वाला हमारा मालिक फरमाता है,
 "क्या तुम यह गुमान करते हों कि जन्नत में चलें जाओगें हालांकि तुम पर वह हालात नहीं आयें जो तुमसे पहले लोगों पर आयें थें। उन्हें बीमारियां और मुसीबतें पहुंची और वह यहां तक झिन्झोड़ें गयें कि (उस समय का) रसुल और उसके साथ वाले ईमान वाले कहने लगें कि अल्लाह कि मदद कब आयेगी? सुन रखों कि अल्लाह कि मदद क़रीब है।"
- क़ुरान 2: 214

ज़रा तसव्वुर कीजियें क्या तकलीफें रही होंगी? जो उस वक़्त के ईमान वालों के साथ उनका रसुल भी पुकार उठा कि अल्लाह की मदद कब आयेगी हम तसव्वुर (कल्पना) भी नहीं कर सकते उनके कष्टों की, कैसी कैसी तकलीफ़ और सज़ाये उन्हे पहुची जो उस दौर का नबी जिसका सीधा राबता अल्लाह से होता है वो भी चीख़ उठा की अल्लाह की मदद कब आयेगी फिर अल्लाह ने यहाँ यह भी बता दिया कि अल्लाह कि मदद क़रीब है यानि आपकी ज़िंदगी में कितनी बड़ी आज़माईश कितनी बड़ी परेशानी क्यों न आ जायें उसके बाद अल्लाह की मदद क़रीब हैं, और यक़ीनी तौर पर अल्लाह की मदद आयेगी ज़रूर, इसी बात को अल्लाह तआला ने एक दुसरी सूरह में कुछ इस तरह बयान किया
"तो यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी (राहत) हैं. यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी हैं"
- क़ुरान 94: 5-6

एक बात को दो बार दोहराने का मक़सद यह होता है कि उस बात को ज़ोर देकर कहा गया है आप सोचिये जब अल्लाह किसी बात को ज़ोर देकर कहें तो भला उसमें किसी प्रकार का सन्देह या शुब्हा बाक़ी रहता हैं? क़तई नहीं,

फिर एक और स्थान पर अल्लाह तआला ने फरमाया कि
"अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त (बरदाश्त) से ज़्यादा बोझ नहीं डालते"
- क़ुरान 2:286

इस आयत से यह भी पता चला कि परेशानी कितनी बड़ी क्यों ना हो इंसान के बर्दाश्त से बाहर नहीं वह डट कर उसका सामना कर सकता है क्योंकि अल्लाह तआला कभी इन्सान पर ऐसी परेशानी नहीं डालते जो उसके बर्दाश्त के बाहर हो आज़माईश के अलावा इन्सान पर परेशानी या कष्ट आने की वजह इन्सान के अपने आमाल (कर्म) भी होते है बहुत सारी परेशानिया उस पर उसके आमाल की वजह से भी आती हैं, अल्लाह फरमाता हैं "जो मुसीबत तुम्हें पहुंचती है वह तो तुम्हारें अपने हाथों की कमाई से पहुंचती है और बहुत कुछ तो वह माफ कर देता है।"
- क़ुरान 42:30

इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपने आमाल अच्छे रखें साथ ही ज़रूरतमंदो को सदक़ा (दान) करता रहें यानी गरीबों की मदद करें क्यूंकि ज़कात व सदक़ा (दान) आने वाली मुसीबतो और परेशानियों को टाल देता है।

लेखक : ज़ीशान अली

#DivineMotivation #ना_उम्मीदी_कुफ्र_है