आज के वक़्त में अक्सर यह देखनें में आता है कि किसी इंसान को अगर थोड़ी सी भी परेशानी या तकलीफ पहुँचताी है तो वह बहुत ज़्यादा परेशान और बेचैन हो उठता है और थोड़ी सी परेशानी से भी इतना घबरा जाता है कि अपने मालिक कि दी हुई सर्वश्रेष्ठ नेमत इस ज़िन्दगी को भी ख़त्म करने के बारे में भी सोचने लगता हैं हक़ीक़त में उसकी इस घबराहट और परेशानी की वजह उसका अपने ज़िन्दगी के मक़सद से नावाक़िफियत हैं उसने इस फ़ानी (नश्वर) दुनियावी ज़िन्दगी को ही हक़ीक़त समझ लिया है जबकि गहराई से देखें तो इस ज़िन्दगी और मौत को अल्लाह ने बनाया ही इसीलिये है ताकि इन्सानों कि आज़माईश की जायें कि कौन अल्लाह का कितना शुक्रगुज़ार और फरमाबरदार हैं (ज़्यादा जानकारी के लिये मेरा पिछला लेख "जीवन का उद्देश्य" पढ़ें और उससे भी अधिक तफसीर से जानने के लिये एक बार क़ुरान का तर्जुमा ज़रूर पढ़ें), ज़रा उन लोगों के बारें में सोचिये जिनकों तपती हुई रेत मे रस्सी से बांध कर लिटा कर उनके जिस्म पर भारी पत्थरो को रख दिया गया, उनकों उनके घरों से निकाल दिया गया, सगे-रिश्तेदार उनके दुश्मन हो गये सिर्फ़ इसलियें कि वह कहते थे कि हमारा माबू्द सिर्फ़ एक अल्लाह है, जिस जन्नत के वह दावेदार थे हम भी उसी जन्नत के दावेदार है तो फिर परेशानिया और तकलीफे तो आयेगी ही क़ुरान में हमारा पैदा करने वाला हमारा मालिक फरमाता है,
"क्या तुम यह गुमान करते हों कि जन्नत में चलें जाओगें हालांकि तुम पर वह हालात नहीं आयें जो तुमसे पहले लोगों पर आयें थें। उन्हें बीमारियां और मुसीबतें पहुंची और वह यहां तक झिन्झोड़ें गयें कि (उस समय का) रसुल और उसके साथ वाले ईमान वाले कहने लगें कि अल्लाह कि मदद कब आयेगी? सुन रखों कि अल्लाह कि मदद क़रीब है।"
- क़ुरान 2: 214
ज़रा तसव्वुर कीजियें क्या तकलीफें रही होंगी? जो उस वक़्त के ईमान वालों के साथ उनका रसुल भी पुकार उठा कि अल्लाह की मदद कब आयेगी हम तसव्वुर (कल्पना) भी नहीं कर सकते उनके कष्टों की, कैसी कैसी तकलीफ़ और सज़ाये उन्हे पहुची जो उस दौर का नबी जिसका सीधा राबता अल्लाह से होता है वो भी चीख़ उठा की अल्लाह की मदद कब आयेगी फिर अल्लाह ने यहाँ यह भी बता दिया कि अल्लाह कि मदद क़रीब है यानि आपकी ज़िंदगी में कितनी बड़ी आज़माईश कितनी बड़ी परेशानी क्यों न आ जायें उसके बाद अल्लाह की मदद क़रीब हैं, और यक़ीनी तौर पर अल्लाह की मदद आयेगी ज़रूर, इसी बात को अल्लाह तआला ने एक दुसरी सूरह में कुछ इस तरह बयान किया
"तो यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी (राहत) हैं. यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी हैं"
- क़ुरान 94: 5-6
एक बात को दो बार दोहराने का मक़सद यह होता है कि उस बात को ज़ोर देकर कहा गया है आप सोचिये जब अल्लाह किसी बात को ज़ोर देकर कहें तो भला उसमें किसी प्रकार का सन्देह या शुब्हा बाक़ी रहता हैं? क़तई नहीं,
फिर एक और स्थान पर अल्लाह तआला ने फरमाया कि
"अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त (बरदाश्त) से ज़्यादा बोझ नहीं डालते"
- क़ुरान 2:286
इस आयत से यह भी पता चला कि परेशानी कितनी बड़ी क्यों ना हो इंसान के बर्दाश्त से बाहर नहीं वह डट कर उसका सामना कर सकता है क्योंकि अल्लाह तआला कभी इन्सान पर ऐसी परेशानी नहीं डालते जो उसके बर्दाश्त के बाहर हो आज़माईश के अलावा इन्सान पर परेशानी या कष्ट आने की वजह इन्सान के अपने आमाल (कर्म) भी होते है बहुत सारी परेशानिया उस पर उसके आमाल की वजह से भी आती हैं, अल्लाह फरमाता हैं "जो मुसीबत तुम्हें पहुंचती है वह तो तुम्हारें अपने हाथों की कमाई से पहुंचती है और बहुत कुछ तो वह माफ कर देता है।"
- क़ुरान 42:30
इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपने आमाल अच्छे रखें साथ ही ज़रूरतमंदो को सदक़ा (दान) करता रहें यानी गरीबों की मदद करें क्यूंकि ज़कात व सदक़ा (दान) आने वाली मुसीबतो और परेशानियों को टाल देता है।
लेखक : ज़ीशान अली
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