Saturday, April 11, 2015

क्या हिन्दू धर्म से विकृत शब्द दुनिया में प्रयुक्त होते हैं?



आजकल कुछ संघी विचारधारा वाले हिन्दू कहते फिर रहे हैं की हिन्दू धर्म प्राचीन काल में सम्पूर्ण जगत में पूरी दुनिया में फैला हुआ था जबकि इतेहासिक तथ्य इसके बिलकुल विपरीत हैं इतेहास से पता चलता हैं की हिन्दू धर्म कभी भारतवर्ष के बहार गया ही नहीं था जैसा की मेने अपने पिछले लेख में भी लिखा था की ' हिन्दू धर्म कभी भारतीय उपमहादीप के बहार नहीं गया और ना ही कभी भारतीय उपमहादीप के बहार कोई हिन्दू धर्म के मानने वाला या कोई हिन्दू मंदिर रहा हैं पुरे सऊदी अरब, बहरीन, मिस्र, इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, रोम, टर्की, अमेरिका, अफ्रीका, रूस आदि के इतिहास में वैदिक धर्म का या किसी भारतीय देवता के मंदिर का कोई नामो निशान भी नहीं मिलता'
किन्तु कुछ लोग ज़बरदस्ती अपने कुतर्को की सहायता से ये बात साबित करने की कोशिश में लगे हुए हैं की संसार में हर जगह केवल हिन्दू धर्म था और उसके लिए अपने ज़बरदस्ती के कुतर्क प्रस्तुत करते हैं जैसे की हाल ही में 'हिन्दुराष्ट्र' ने अपने लेखो में लिखा था 'अरब का नाम और्व के ही नाम पर पड़ा, जो विकृत होकर “अरब” हो गया, कालांतर में ‘काव्य’ नाम विकृत होकर ‘काबा’ प्रचलित हुआ, तथा इसी तरह मक्का के विषय भी उसने लिखा था की मक्का दरअसल संस्कृत भाषा के शब्द मख: से बना हैं आदि यह सब सिर्फ कुतर्क हैं स्वयं को साबित करने के हर भाषा में मिलते जुलते नाम और शब्द होते हैं किन्तु इसका ये अर्थ नहीं की वो दूसरी भाषा से लिए गए हैं जैसे मुसलमानों में यहूदियों में और ईसाईयों में समान रूप से तथा विश्व इतेहास में भी मिस्र के एक राजा फ़िरोन रामासिस द्वितीय को एक निरंकुश, अत्याचारी तथा ज़ालिम शासक के रूप वर्णन मिलता हैं यदि अब में ये कहूँ की ये रामासिस असल में हिन्दुओ के राजा राम ही हैं और ये मिस्र की सभ्येता से विकृत हो कर हिन्दुओ में भगवान राम के रूप में प्रसिद्ध हो गए क्या आप इस पर विश्वास करेंगे? क्या आप मानेंगे की आपके राजा भगवान् राम एक निरंकुश और अत्याचारी शासक थे?
सिर्फ शब्दों के मिलने से आप किसी व्यक्ति या वास्तु को ये नहीं कह सकते की यह किसी और भाषा और संस्कृति से विकृत हो कर दूसरी भाषा में आये हैं और यदि ऐसा कहते हैं तो मेरी दलील तो और ठोस हैं क्यूंकि हिन्दुराष्ट्र ने ज़बरदस्ती न मिलते हुए शब्दों को मिलाने की कोशिश की हैं मगर मेने जो नाम लिए है हैं वो तो एक ही हैं राम.
कल को कही हिन्दुराष्ट्र और उसके जैसी मानसिकता वाले लोग ये दावा नहीं कर दें की जे. के. रोव्लिंग के उपन्यास और हॉलीवुड मूवी का चरित्र हैरी पॉटर दरअसल वास्तविक चरित्र था जो हिन्दू ग्रंथो से विकृत हो कर अंग्रेजो में और उनकी भाषा में पहुच गया और हैरी पॉटर (Harry Potter) दरअसल हरी पुत्र (Hari Potr) हैं जो हिन्दुओं के बहुत बड़े भगवान् हरी यानि विष्णु का पुत्र हैं?

लेखक - ज़ीशान अली खान (www.facebook.com/zeeshan3745)



मुहम्मद सल्ल० ग़ैर मुस्लिमो की नज़र मे


प्रो. कृष्णा राऊ :
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के व्यक्तित्व की पूरी सच्चाई में उतर पाना सबसे कठिन हैं में केवल उसकी एक झलक ही पा सकता हूँ. सिनेमा के दृश्यों जैसा कैसा नाटकीय अनुक्रम हैं. ये मुहम्मद हैं, देवदूत-यह मुहम्मद, जनरल- ये मुहम्मद हैं, बिजनेसमैन- मुहम्मद, प्रचारक-मुहम्मद, दार्शनिक- मुहम्मद, व्यवस्थापक- मुहम्मद, सुवक्ता- मुहम्मद, सुधारक- मुहम्मद, अनाथो का सहारा- मुहम्मद, गुलामो का संरक्षक- मुहम्मद, स्त्रियों का उद्धारकर्ता- मुहम्मद, नियायधीश- मुहम्मद, संत और इन सभी प्रतापिमान मैदानों में, मानव गहमागहमी के इन सभी विभागों में वह एक हीरो के सामान है.
- The Prophet of Islam by Prof. Ram Krishna Rao, (then) head of the department of philosophy, Maharani Arts College for Women, crecent publishing co. IIIrd Edition, 1982- p17.







स्वामी विवेकानंद (विश्व-विख्यात धर्मविद्)
‘‘...मुहम्मद (इन्सानी) बराबरी, इन्सानी भाईचारे और तमाम मुसलमानों के भाईचारे के पैग़म्बर थे। ...जैसे ही कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है पूरा इस्लाम बिना किसी भेदभाव के उसका खुली बाहों से स्वागत करता है, जबकि कोई दूसरा धर्म ऐसा नहीं करता। ...हमारा अनुभव है कि यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने इस (इन्सानी) बराबरी को दिन-प्रतिदिन के जीवन में व्यावहारिक स्तर पर बरता है तो वे इस्लाम और सिर्फ़ इस्लाम के अनुयायी हैं। ...मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने जीवन-आचरण से यह बात सिद्ध कर दी कि मुसलमानों में भरपूर बराबरी और भाईचारा है। यहाँ वर्ण, नस्ल, रंग या लिंग (के भेद) का कोई प्रश्न ही नहीं। ...इसलिए हमारा पक्का विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत—चाहे वे कितने ही उत्तम और अद्भुत हों—विशाल मानव-जाति के लिए मूल्यहीन (Valueless) हैं...।’’
—‘टीचिंग्स ऑफ विवेकानंद, पृष्ठ-214, 215, 217, 218), अद्वैत आश्रम, कोलकाता-2004







राजेन्द्र नारायण लाल (एम॰ ए॰ (इतिहास) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
‘‘...संसार के सब धर्मों में इस्लाम की एक विशेषता यह भी है कि इसके विरुद्ध जितना भ्रष्ट प्रचार हुआ किसी अन्य धर्म के विरुद्ध नहीं हुआ । सबसे पहले तो महाईशदूत मुहम्मद साहब की जाति कु़रैश ही ने इस्लाम का विरोध किया और अन्य कई साधनों के साथ भ्रष्ट प्रचार और अत्याचार का साधन अपनाया। यह भी इस्लाम की एक विशेषता ही है कि उसके विरुद्ध जितना प्रचार हुआ वह उतना ही फैलता और उन्नति करता गया तथा यह भी प्रमाण है—इस्लाम के ईश्वरीय सत्य-धर्म होने का। इस्लाम के विरुद्ध जितने प्रकार के प्रचार किए गए हैं और किए जाते हैं उनमें सबसे उग्र यह है कि इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला, यदि ऐसा नहीं है तो संसार में अनेक धर्मों के होते हुए इस्लाम चमत्कारी रूप से संसार में कैसे फैल गया? इस प्रश्न या शंका का संक्षिप्त उत्तर तो यह है कि जिस काल में इस्लाम का उदय हुआ उन धर्मों के आचरणहीन अनुयायियों ने धर्म को भी भ्रष्ट कर दिया था। अतः मानव कल्याण हेतु ईश्वर की इच्छा द्वारा इस्लाम सफल हुआ और संसार में फैला, इसका साक्षी इतिहास है...।’’
‘‘...इस्लाम को तलवार की शक्ति से प्रसारित होना बताने वाले (लोग) इस तथ्य से अवगत होंगे कि अरब मुसलमानों के ग़ैर-मुस्लिम विजेता तातारियों ने विजय के बाद विजित अरबों का इस्लाम धर्म स्वयं ही स्वीकार कर लिया। ऐसी विचित्र घटना कैसे घट गई? तलवार की शक्ति जो विजेताओं के पास थी वह इस्लाम से विजित क्यों हो गई...?’’
‘‘...मुसलमानों का अस्तित्व भारत के लिए वरदान ही सिद्ध हुआ। उत्तर और दक्षिण भारत की एकता का श्रेय मुस्लिम साम्राज्य, और केवल मुस्लिम साम्राज्य को ही प्राप्त है। मुसलमानों का समतावाद भी हिन्दुओं को प्रभावित किए बिना नहीं रहा। अधिकतर हिन्दू सुधारक जैसे रामानुज, रामानन्द, नानक, चैतन्य आदि मुस्लिम-भारत की ही देन है। भक्ति आन्दोलन जिसने कट्टरता को बहुत कुछ नियंत्रित किया, सिख धर्म और आर्य समाज जो एकेश्वरवादी और समतावादी हैं, इस्लाम ही के प्रभाव का परिणाम हैं। समता संबंधी और सामाजिक सुधार संबंधी सरकरी क़ानून जैसे अनिवार्य परिस्थिति में तलाक़ और पत्नी और पुत्री का सम्पत्ति में अधिकतर आदि इस्लाम प्रेरित ही हैं...।’’
—‘इस्लाम एक स्वयंसिद्ध ईश्वरीय जीवन व्यवस्था’
पृष्ठ 40,42,52 से उद्धृत
साहित्य सौरभ, नई दिल्ली, 2007 ई॰








मुंशी प्रेमचंद (प्रसिद्ध साहित्यकार):
‘‘...जहाँ तक हम जानते हैं, किसी धर्म ने न्याय को इतनी महानता नहीं दी जितनी इस्लाम ने। ...इस्लाम की बुनियाद न्याय पर रखी गई है। वहाँ राजा और रंक, अमीर और ग़रीब, बादशाह और फ़क़ीर के लिए ‘केवल एक’ न्याय है। किसी के साथ रियायत नहीं किसी का पक्षपात नहीं। ऐसी सैकड़ों रिवायतें पेश की जा सकती है जहाँ बेकसों ने बड़े-बड़े बलशाली आधिकारियों के मुक़ाबले में न्याय के बल से विजय पाई है। ऐसी मिसालों की भी कमी नहीं जहाँ बादशाहों ने अपने राजकुमार, अपनी बेगम, यहाँ तक कि स्वयं अपने तक को न्याय की वेदी पर होम कर दिया है। संसार की किसी सभ्य से सभ्य जाति की न्याय-नीति की, इस्लामी न्याय-नीति से तुलना कीजिए, आप इस्लाम का पल्ला झुका हुआ पाएँगे...।’’
‘‘...जिन दिनों इस्लाम का झंडा कटक से लेकर डेन्युष तक और तुर्किस्तान से लेकर स्पेन तक फ़हराता था मुसलमान बादशाहों की धार्मिक उदारता इतिहास में अपना सानी (समकक्ष) नहीं रखती थी। बड़े से बड़े राज्यपदों पर ग़ैर-मुस्लिमों को नियुक्त करना तो साधारण बात थी, महाविद्यालयों के कुलपति तक ईसाई और यहूदी होते थे...।’’
‘‘...यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस (समता) के विषय में इस्लाम ने अन्य सभी सभ्यताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है। वे सिद्धांत जिनका श्रेय अब कार्ल मार्क्स और रूसो को दिया जा रहा है वास्तव में अरब के मरुस्थल में प्रसूत हुए थे और उनका जन्मदाता अरब का वह उम्मी (अनपढ़, निरक्षर व्यक्ति) था जिसका नाम मुहम्मद (सल्ल॰) है। मुहम्मद (सल्ल॰) के सिवाय संसार में और कौन धर्म प्रणेता हुआ है जिसने ख़ुदा के सिवाय किसी मनुष्य के सामने सिर झुकाना गुनाह ठहराया है...?’’
‘‘...कोमल वर्ग के साथ तो इस्लाम ने जो सलूक किए हैं उनको देखते हुए अन्य समाजों का व्यवहार पाशविक जान पड़ता है। किस समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़ माना गया है जितना इस्लाम में? ...हमारे विचार में वही सभ्यता श्रेष्ठ होने का दावा कर सकती है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक उठने का अवसर दे। इस लिहाज़ से भी इस्लामी सभ्यता को कोई दूषित नहीं ठहरा सकता।’’
‘‘...हज़रत (मुहम्मद सल्ल॰) ने फ़रमाया—कोई मनुष्य उस वक़्त तक मोमिन (सच्चा मुस्लिम) नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई-बन्दों के लिए भी वही न चाहे जितना वह अपने लिए चाहता है। ...जो प्राणी दूसरों का उपकार नहीं करता ख़ुदा उससे ख़ुश नहीं होता। उनका यह कथन सोने के अक्षरों में लिखे जाने योग्य है—‘‘ईश्वर की समस्त सृष्टि उसका परिवार है वही प्राणी ईश्वर का (सच्चा) भक्त है जो ख़ुदा के बन्दों के साथ नेकी करता है।’’ ...अगर तुम्हें ख़ुदा की बन्दगी करनी है तो पहले उसके बन्दों से मुहब्बत करो।’’
‘‘...सूद (ब्याज) की पद्धति ने संसार में जितने अनर्थ किए हैं और कर रही है वह किसी से छिपे नहीं है। इस्लाम वह अकेला धर्म है जिसने सूद को हराम (अवैध) ठहराया है...।’’
—‘इस्लामी सभ्यता’ साप्ताहिक प्रताप, विशेषांक दिसम्बर 1925







Friday, April 10, 2015

पुनर्जन्म का सच

इस्लाम पुनर्जन्म में विश्वास रखता हैं और ये उसकी बुनयादी शिक्षाओ में से एक हैं पुनर्जन्म का शाब्दिक अर्थ होता हैं दोबारा से जन्म पुन: अर्थात दोबारा, जन्म अर्थात जन्म, पुनर्जन्म का अर्थ दोबारा से जन्म होता हैं न की बार-बार तीसरी या चौथी आदि बार जन्म और हर मुसलमान मरने के बाद महाप्रलय (क़यामत) के दिन दोबारा से जिंदा किये जाने पर विश्वास रखता हैं और दूसरी बात बार-बार, हर बार के लिए बिलकुल अलग ही परिभाषित शब्द होता हैं जिसे हम अवागमन के नाम से जानते हैं अवागमन का सिद्धान्त में धारणा रखने वाले लोग यह विश्वास रखते हैं की व्यक्ति अपने पिछले कर्मो के अनुसार इसी लोक में अलग अलग योनियो में पैदा किया जाता हैं और पिछले कर्मो के अनुसार ही वो इस जीवन में जीवन व्यतीत करता हैं,

आइये, अवागमन के सिद्धान्त को मानने वाले लोग क्या-क्या धरना रखते हैं उसे देखें:

(1) कुछ लोगो का मानना हैं कि 'मनुष्य अपने कर्मानुसार ही इसी लोक में जानवर या वनस्पति श्रेणी में जन्म लेता हैं।'

(2) कुछ लोग यह मानते हैं कि 'हम नर्क या स्वर्ग में तो जायेंगे मगर हमारे हिस्से में कुछ पुण्ये या पाप बचेगा तो इश्वर हमें फिर इसी दुनिया में किसी भी जीव कि श्रेणी में भेज देगा और फिर यही क्रम चलता रहेगा।'

(3) कुछ लोग ये कहते हैं कि 'अवागमन के चक्र से कभी किसी को मुक्ति नहीं मिलेगी।'

(4) कुछ लोग ये कहते हैं कि 'नहीं, बार-बार जन्म लेते रहने से कभी तो पाप खत्म होंगे-फिर हम को मोक्ष प्राप्त हो जायेगा।'

(5) कुछ अन्य लोग यह कहते हैं कि 'इंसान अपने बुरे कर्मो के बदले में कोई जानवर या वनस्पति बनेगा और इसी लोक में अपने बुरे कर्मो के फल भुक्तेगा'।

आइये आवागमन के सिद्धान्त का बुद्धि-विवेक व शास्त्रों के आधार पर विवेचनात्मक मूल्यांकन करें

सबसे पहले ये ज्ञात रहे कि सत्य एक होता और झूट कई प्रकार का होता हैं। पुनर्जन्म कि आस्था सब इश्ग्रन्थो में एक प्रकार कि हैं चाहे वो वेदों में हो या बाइबिल में या फिर कुरान में, लेकिन आवागमन में आस्था कई प्रकार से दिखाई जाती हैं, जिससे मालूम होता हैं कि पुनर्जन्म का सिद्धान्त सही हैं और आवागमन का ग़लत।

कर्म योनि - भोग योनि
कर्म योनि वो योनि होती हैं जहा हमें कर्म करने होते हैं।  भोग योनि वो योनि होती हैं जहा हमें हमारे कर्म के अनुसार भोग भोगना होता हैं।

हिन्दू पोराणिक विधान के अनुसार मनुष्य योनि 'कर्म व भोग दोनों योनि हैं' अर्थात मनुष्य को केवल  इसी योनि में कर्म करने होते हैं और साथ साथ उसे अपने पिछले कर्मो का फल भी भोगना होता हैं।  जबकि 'जानवर व वनस्पति योनि' केवल भोग योनि होती हैं, वहा कोई कर्म नहीं होता अर्थात जानवर तो इसलिए जानवर हैं क्यूंकि पहले वे मनुष्य योनि में कुछ ऐसे कर्म करके आया था कि अब वो जानवर बना दिया गया।

हमें हमारे धार्मिक ग्रंथो और विज्ञान ने बताया कि समय के प्रारंभ में इस धरती पर कुछ नहीं था ये धरती सूर्य का एक अंग थी  हीर वो अंग अलग हो कर सूर्य के चारो ओर चक्कर काटने लगा इसलिए धरती के अन्दर आज भी भीषण गर्मी हैं।  उस ठन्डे हिस्से को भुप्रष्ट या भूपटल कहते हैं जिस पर हम रहते हैं इस भूपटल के ठंडा होने के बहुत अन्तराल के बाद, इस पर पानी बरसा, फिर भिन्न-भिन्न प्रकार कि वनस्पति उगी, फिर एक लम्बी अवधि के के उपरान्त, जानवर आये फिर वनस्पति व जानवरों कि दीर्घावधि के के बाद मनुष्य इस धरती पर आया। ये पूरी कार्यप्रणाली एक ज्ञात सत्य हैं।
इस कार्यप्रणाली को देखें तो हमे पता चलता हैं कि
(का) पहले इस धरती का कुछ भी नहीं था,
(ख) फिर पानी बरसा और पेड़ पोधे उगे जो कि केवल भोग योनि हैं।
(ग) फिर एक दीर्घावधि गुज़र जाने के बाद जानवर इस धरती पर आये ये भी भोग हैं।
(घ) जानवरों कि दीर्घावधि उपरान्त भूपटल पर हम मनुष्य आये, जो कि भोग व कर्म योनि हैं।
अगर हम इस पूरी प्रणाली पर नज़र डाले तो यह इस पोस्ट के नीचे के चित्र के सामान होगी

अब प्रश्न जो हर चिंतन करने वाले कि बुद्धि में आएगा वो ये कि ऊपर उध्दरित तथ्य में भोग योनिय तो पहले आई और कर्म योनि बाद में!!! ऐसा कैसे संभव हैं? होना तो यह चाहिए था कि पहले मनुष्य आता वो कर्म करता फिर अपने कर्मो के भोग भोगता परन्तु ऐसा हुआ नहीं पहले ईश्वर ने एक नहीं दो दो योनियाँ रखी और बाद में मनुष्य को भेजा क्यूंकि हमारा मालिक सर्वज्ञता हैं।  उसे मालूम था कि कुछ लोग 'आवागमन' के सिद्धान्त में फंसकर अपने मृत्यु उपरांत अनंत जीवन, जो उन्हें इश्वर के पास प्राप्त होना था, उसे सदा के लिए नर्क में प्रवेश पाकर नष्ट कर लेंगे।  हमारे  अति कृपालु ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण में चेतना रखी हैं। आवश्यकता हैं की हम स्वयं अपने विवेक से निर्णय करें।



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इस्लाम विरोधी प्रश्नो के उत्तर 








जीव हत्या और मांसाहार