इस्लाम से पहले किसी मज़हब में तलाक का कांसेप्ट नहीं था।
अल्लाह ने इंसानो के लिए एक आसानी की कि अगर पति पत्नी की आपस में नहीं बन रही है तो वो तलाक ले कर अलग हो सकते है और दूसरी जगह शादी कर सकते है।
लेकिन लोग कहीं पति पत्नी के इस खूबसूरत रिश्ते को खेल-तमाशा ना बना लें,
कि ज़रा-ज़रा सी बात पर तलाक ले कर अलग हो जायें और फ़िर कुछ दिन बाद निकाह कर लें फ़िर ज़रा सी बात पर तलाक, तो इस तरह जो फॅमिली सिस्टम है वो पूरी तरह बिगड़ जाएगा और बच्चों की परवरिश भी ठीक से नहीं हो पाएगी।
इसके लिये अल्लाह ने कुछ हद्द और लिमिट भी तय कर दी।
निकाह (शादी) कोई खेल तमाशा नहीं यह संजीदा (serious) मामला है,
अल्लाह ने इंसान को तीन मौक़े दिए तलाक के लिये की अगर आपकी नहीं बनती तो आप तलाक ले कर अलग हो जाओ
लेकिन इंसान कई बार जल्दबाजी में बिना सोचे समझे फ़ैसले ले लेता है।
और बाद मे उन पर पछतावा करता है इसी प्रकार किसी ने जल्दबाजी में या वक़्ती ग़ुस्से में तलाक दे दी और फ़िर बाद में अफ़सोस हुआ कि मैंने यह क्या किया अपना पूरा बसा हुआ घर बर्बाद कर लिया,
तो उसके पास दोबारा मौक़ा है कि वो अपनी बीवी से इद्दत (तलाक के बाद 3 महीने का समय जिसमें पत्नी उसी पति के घर में रहती है) के दौरान रुजु कर सकता है बिना निकाह के या इद्दत के बाद नया निकाह करके दोबारा से पति पत्नी की तरह रह सकते है।
फ़िर कुछ समय बाद किसी वजह से उनमें तलाक हो जाता है तो फिर यही प्रकिया (same process) है दोबारा से पति पत्नी की तरह रह सकते है फ़िर किसी वजह से तलाक होती है तो अब इस्लाम मे इस पर पाबंदी लग जाती है, कि तुमने पति पत्नी जैसे महत्वपूर्ण रिश्ते को मजाक बना रखा है अब दोबारा उन पति पत्नी का निकाह नहीं हो सकता इतने मौक़े आपको मिले लेकिन आपने उनकी क़दर नहीं की शादी को खेल-तमाशा, हँसी-मज़ाक़ बना दिया
अब तीसरी बार यह लोग शादी करके पति पत्नी बन कर नहीं रह सकते।
सिवाय एक कंडीशन के कि उस औरत के लिए (बिना किसी प्लानिंग के) कोई रिश्ता आता है और औरत की पसंद से औरत का निकाह कहीं और हो जाता है और फ़िर दूसरे पति के साथ मे भी कोई ऐसी कंडीशन आती है (ध्यान रहे यह हालात ख़ुद से आये हो ना कि कोई सुनियोजित तरीके से) और दूसरा पति भी उन्हें तलाक दे देता है तो फ़िर अब वो औरत चाहे तो अपने पहले पति से निकाह कर सकती है।
जो लोग यह काम सुनियोजित (pre-planned) तरीक़े से करते है
उनके बारे मे आप सल्लo ने फ़रमाया:
"हलाला करने वाले और हलाला करवाने वाले (दोनों) पर लानत फरमायी है."
- तिरमिज़ी, हदीस नंo 1120
लेखक : ज़ीशान अली
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