कुरान मे है:
"फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो काफिरों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
-कुरान 9:5
कुरआन के खिलाफ़ बोलने वाले लोग अक्सर इस आयात को पेश करते है और कहते है कि अल्लाह मुसलमानों को काफिरों को मारने का हुक्म देता है,
और वो इसके आगे पीछे की आयतों को छुपा जाते है इससे आप उनकी नियत का अंदाज़ा लगा सकते है कि अगर कुरआन पर उंगली उठाने वाले यह लोग सच्चे होते तो आगे पीछे की आयते ज़रूर पेश करते ताकि इसका पूरा प्रसंग समझा जा सके क्यूँकि किसी भी बात को अगर उसके प्रसंग (पसमंज़र) से अलग करके बयान किया जाए तो अर्थ का अनर्थ किया जा सकता है इससे ज़ाहिर होता है इनका मक़सद सिर्फ इस्लाम के विरुध्द दुष्प्रचार करना है।
अब इस आयत को आगे पीछे की आयतों के साथ पढ़ें तो बात समझ मे आयेगी
*सूरह अत-तौबा, 9*
9:1 "मुशरिकों (बहुदेववादियों) से जिनसे तुमने संधि की थी, विरक्ति (की उदघोषणा) है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से।"
9:2 "अतः इस धरती में चार महीने और चल-फिर लो और यह बात जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और यह कि अल्लाह इनकार करनेवालों को अपमानित करता है।"
9:3 "सार्वजनिक उदघोषणा है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से, बड़े हज के दिन लोगों के लिए, कि "अल्लाह मुशरिकों के प्रति ज़िम्मेदारी से बरी है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम तौबा कर लो, तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है, किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो, तो जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते।" और इनकार करनेवालों के लिए एक दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो।"
9:4 "सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की, तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"
9:5 "फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
9:6 "और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं।"
9:7 "इन मुशरिकों को किसी संधि की कोई ज़िम्मेदारी अल्लाह और उसके रसूल पर कैसे बाक़ी रह सकती है? - उन लोगों का मामला इससे अलग है, जिनसे तुमने मस्जिदे-हराम (काबा) के पास संधि की थी, तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तब तक तुम भी उनके साथ सीधे रहो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"
सारी आयतों से साफ पता चलता है कि यहाँ बात एक विशेष प्रकार के लोगो के बारे मे चल रही है सारे गैर मुस्लिमों के बारें में नहीं, यह आयात मक्के के कुछ विशेष लोगो के बारे मे है जिनकी मुसलमानो से संधि थी इस अध्याय (सूरह) मे उस संधि का ज़िक्र भी है, जब मक्का के उन मुशरिको ने संधि करने के बाद उसे तोड़ा और मुसलमानों से जंग के लिये अमादा हो गए तो अल्लाह ने भी मुसलमानों को प्रोत्साहित करने के लिए यह बाते कही जो कि आम तौर पर हर आर्मी चीफ़ अपनी सेना से कहता है कि दुश्मन को जहा पाओ मार डालो लेकिन अचंभे की बात यह है कि इसी अध्याय मे अल्लाह ने इसके साथ यह भी हुक्म दिया कि अगर जंग के मैदान में भी कोई तुमसे अमन की बात करें तो जंग को भूल कर अपनी जान पर खेलकर उसकी हिफाज़त करो और उसे महफूज़ जगह पहुचा कर आओ।
ऐसा आदेश दुनिया का कोई भी कमांडर नहीं दे सकता।
और इसी अध्याय की दूसरी आयात मे अल्लाह ने यह भी वाज़ेह कर दिया कि यह आदेश सिर्फ उन मुशरिको के लिए है जिन्होंने संधि तोड़ कर तुमसे ऐलान ए जंग किया है, और बाक़ी लोग जैसे वो जिन्होंने मस्जिद ए हराम (काबा) के पास तुमसे संधि की आदि के लिए नहीं है, उनके साथ तुम अच्छा सुलूक रखो और संधि को पूरा करते रहो।
यह एक विशेष आदेश है और विशेष लोगो के लिये था आम गैर-मुस्लिमों के साथ कैसा बर्ताव करना है वो और आयतों में ज़िक्र है उदहारण के लिए इस आयत में आम आदेश मौजूद है :
"जिन लोगो ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुमको तुम्हारे घरो से निकाला, उनके साथ भलाई और इन्साफ का सुलूक करने से अल्लाह तुमको मना नहीं करता, अल्लाह तो इन्साफ करने वालो को दोस्त रखता हैं।"
- कुरान 60:08
लेखक : ज़ीशान अली
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